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जग सूना माँ बिन

राजबाला शर्मा ‘दीप’
अजमेर(राजस्थान)
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माँ बिन…!

माँ बिन सारा जग है सूना,
पल-पल याद मैं करती हूँ
जीवन-दात्री, ज्योतिपुंज माँ,
शत-शत नमन मैं करती हूँ।

जब भी मैं जीवन से हारी,
तुम संबल बन जाती थीं
दु:ख की धूप में तुम आँचल-सी,
छाँह मेरी बन जाती थीं
मेरी पहचान हो,मेरा मान हो,
खुद को धन्य समझती हूँ।
शत-शत नमन मैं करती हूँ…

आस-पास जो तुम ना दिखतीं,
मैं उदास हो जाती हूँ
तेरी स्मृतियों से बात कर,
मैं खुद को बहलाती हूँ
तेरी यादों से भरा पिटारा,
खोल के पढ़ती रहती हूँ।
शत-शत नमन मैं करती हूँ….

कभी-कभी ऐसा लगता है,
पास मेरे तुम आई हो
गोद में अपनी सर रखकर,
मुझे मीठी नींद सुलाई हो
आँख खुली तो सपना था,
सपनों के भरम में जीती हूँ।
शत-शत नमन मैं करती हूँ…

जब तेरा छवि-चित्र में देखूँ,
आँख मेरी भर आती है
प्यार तुम्हें इतना करती हूँ,
शब्दों में न कह पाती हूँ।
तेरी पावन चरण-धूल,
मस्तक से लगाती रहती हूँ।
जीवन-दात्री, ज्योतिपुंज माँ,
शत-शत नमन मैं करती हूँ॥

परिचय– राजबाला शर्मा का साहित्यिक उपनाम-दीप है। १४ सितम्बर १९५२ को भरतपुर (राज.)में जन्मीं राजबाला शर्मा का वर्तमान बसेरा अजमेर (राजस्थान)में है। स्थाई रुप से अजमेर निवासी दीप को भाषा ज्ञान-हिंदी एवं बृज का है। कार्यक्षेत्र-गृहिणी का है। इनकी लेखन विधा-कविता,कहानी, गज़ल है। माँ और इंतजार-साझा पुस्तक आपके खाते में है। लेखनी का उद्देश्य-जन जागरण तथा आत्मसंतुष्टि है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-शरदचंद्र, प्रेमचंद्र और नागार्जुन हैं। आपके लिए प्रेरणा पुंज-विवेकानंद जी हैं। सबके लिए संदेश-‘सत्यमेव जयते’ का है।

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