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ज़िन्दगी

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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अभी तक भँवर में फंसी नाव मेरी,
कहीं दिख पड़ता किनारा नहीं है।

हैं राहों में काँटे मगर चलना मुझको,
अँधेरों में बन दीप जलना है मुझको
मुझे आंधियों का नहीं डर है कोई,
अभी रोशनी बन बिखरना है मुझको।

डुबो देंगी दरिया की उद्धाम लहरें,
किसी को अभी तक पुकारा नहीं है।
अभी तक भँवर में…

निभाना है रिश्ता मुझे गुर्बतों से,
नहीं दूर रहना मुझे निस्बतों से
अभी दर्द की इन्तहा तक है जाना,
अभी लड़ना है ग़म के उन पर्वतों से।

लड़ूँगा सभी से हूँ चाहे अकेला,
भले अब किसी का सहारा नहीं है।
अभी तक भँवर में…

सहारा है मुझको फ़कत बंदगी का,
अभी पीना बाकी ग़रल ज़िन्दगी का,
मुझे है पता ये ज़माना है कैसा,
मगर फलसफ़ा है यही ज़िन्दगी का।

पता है मुझे क्या है अंजाम इसका,
बिना इसके कोई गुज़ारा नहीं है।
अभी तक भँवर में…

अभी मैंने दुनिया को जाना नहीं है,
है बेदर्द इतनी ये माना नहीं है
जरा सा समझ लूँ मैं फ़ितरत जहां की,
ये किस्सा कहानी फ़साना नहीं है।

सफ़र ज़िन्दगी का बहुत ही है मुश्किल,
कभी भी ये मिलती दुबारा नहीं है।

अभी तक भँवर में फंसी नाव मेरी,
कहीं दिख पड़ता किनारा नहीं है॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है

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