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जीत-हार में

डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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उलझन ही उलझन जीवन में,
फिर क्यों बात धरूँ मैं मन में
नासमझी में जिद करने की,
बात बहुत बुरी होती है
कभी-कभी हार में भी,
जीत छिपी होती है।

क्या करना है जीत-हार में,
बढ़ना है आगे जीवन में
छोटी-छोटी बातों पर यूँ,
फिर तकरार बुरी होती है
कभी-कभी हार में भी,
जीत छिपी होती है।

हृदय वेदना थोड़ी सह लूँ,
अपने सुख औरों को दे दूँ
क्या सही और क्या गलत!
सबकी सोंच अलग होती है
कभी-कभी हार में भी,
जीत छिपी होती है।

किस्मत से पाना और खोना,
बात बात पर फिर क्या रोना
समझौता थोड़े गम से कर लूँ,
जीवन की राह सरल होती है
कभी-कभी हार में भी,
जीत छिपी होती है।

रिश्ते को बड़े जतन से संभालें,
लघुता-प्रभुता का भेद मिटा लें
इर्ष्या, द्वेष और अहंकार की
राह बहुत बुरी होती है।
कभी-कभी हार में भी,
जीत छिपी होती है॥

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