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देश के वीरों

संतोष भावरकर ‘नीर’ 
गाडरवारा(मध्यप्रदेश)
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देश के वीरों का हम,
सब करते आह्वान हैं।
होता स्वदेश पर हर,
भारतवासी कुर्बान है।
चकाचौंध भरी धरा,
 दृष्टि रखते हम विशाल
सुख-वैभव तज,पंत पर,
सदा होता ध्यान है।
परिवर्तन की आंधी का,
उदघोष लिए अब
मानव ही करता नित-नित,
नए उत्थान है।
वीरों उठो दृढ़ प्रतिज्ञा कर,
 दिल में लो ठान
आत्मा का नहीं होता
कभी भी अवसान है।
आंधी तूफानों से डरना
नहीं हमने सीखा,
राष्ट्रीय चेतना का करते
गौरवशाली गान हैं।
हिम शिखरों पर चढ़,
तूफानों का रास्ता रोक।
अम्बर में विजय पताका,
फहराता हिंदुस्तान है।
 दुश्मनों की फौजों को,
अब हमने ललकारा है।
जान हथेली पर रख,
करते हम जंगे-एलान है।
हिन्द सागर की लहरों-सा
प्रमुदित हृदय लिए,
आलिंगन करता अम्बरों-सा
 फैला अभिमान है।
संस्कृति को शाश्वत,
कर आलोक बिखेरता।
वतन का गा रहा है,
हर पल अब मधुगान है।
क़फ़न बांध अब निकल,
चले जो रण में ‘नीर।’
जन्मभूमि के गौरव पे मर
मिटने का हमें वरदान है॥
परिचय-संतोष भावरकर का साहित्यिक उपनाम-नीर है। इनकी जन्मतिथि २३ मार्च १९७५ तथा जन्म स्थान-जिला छिंदवाड़ा है। आप वर्तमान में सालीचौका रोड,गाडरवारा (म.प्र.)में निवासरत एवं यही स्थाई पता है। एम.ए.(संस्कृत साहित्य,हिंदी साहित्य),बी.एड और पीजीडीसीए की शिक्षा प्राप्त श्री भावरकर का कार्यक्षेत्र-अध्यापक का है। लेखन विधा-गीत,ग़ज़ल,कविता,कहानी और लेख है।राष्ट्र स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में १९९२ से सतत लगभग ४०० कविता,आलेख,ग़ज़ल,गीत,कहानी और मुक्तक का प्रकाशन हो चुका है। साथ ही कई ई-पत्रिकाओं में भी कविता प्रकाशित हुई है। ऎसे ही आपके खाते में प्रकाशित सांझा काव्य संग्रह में-काव्य-कलश,दिव्यतूलिका ,जीवन-सुधा आदि हैं। यदि सम्मान की श्रंखला देखें तो आपको दिल्ली से रचना शतकवीर सम्मान,काव्य-कलश सम्मान ,ग्वालियर से दिव्यतूलिका सम्मान सहित हरियाणा से बाबू बालमुकुंद गुप्त हिंदी साहित्य सेवा सम्मान आदि प्राप्त हैं। अनेक साहित्यिक-सामाजिक-शासकीय संस्थाओं द्वारा भी आपको सम्मान-पत्र एवं प्रशस्ति-पत्र से सम्मानित किया गया है। नीर की दृष्टि में लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा को समृद्ध बनाना एवं समाज में जागृति लाना है।