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ना धरा चीर

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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प्रकृति और खिलवाड़….

समझो पीर,
पर्यावरण जान-
ना धरा चीर।

है कुदरत,
संभाले जो सबको-
यह फ़िक्र क्यों ?

कैसा विकास ?
खिलवाड़ से घाटा-
हुआ विनाश।

नाजुक धरा,
मत करो छलनी-
समझो जरा।

ओ रे मानव!
चेता रही, समझ
क्यों तू दानव ?

जाएगी जान,
बाढ़, भूकंप, सूखा-
अब तो मान।

नियम पाल,
पूरक सब धरा-
काट न डाल।

कर संघर्ष,
रख ले संवेदना-
स्थिति विकट।

न हो विकृति,
पृथ्वी-मैदान-पहाड़-
बचा प्रकृति।

बसा शहर,
जोखिम हर ओर
देख कहर॥

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