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पाश्चात्य संस्कृति बुझा रही चिराग

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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आधुनिकता का यह दौर ना जाने इन युवा पीढ़ी को कहाँ ले जाएगा। पाश्चात्य संस्कृति का रंग शहरों के युवक-युवतियों पर ऐसा चढ़ा है, कि खुलेआम सिगरेट के गुल-छर्रे उड़ा रहे हैं। शराब की बोतलें पार्टी की संस्कृति बनता जा रही है। जैसे यह अमृत है ? इस आपा-धापी व दिन-रात की भागम-भाग में युवा पीढ़ी सुकून की तलाश में सप्ताह में मिलने वाली छुट्टियों में फार्म हाउस, शहर से दूर पर्यटन स्थलों पर जंगलों में बसेरा कर के नशे में चूर होकर आनंद व उल्लास तलाशते हैं।

इस दौर में अगर हम देखें तो बचपन जल्दी ही खत्म हो रहा है और मोबाइल के इस दौर में आधुनिकता का जूनून सिर चढ़ कर बोल रहा है। आज आधुनिक सुविधाओं में युवा पीढ़ी जल्दी बड़ी हो रही है। विद्यालय-महाविद्यालय की इस जीवन-शैली और कैफे, माॅल व पब की भागीदारी इसमें बहुत ज्यादा है, क्योंकि इन सभी चीजों से नकारात्मक ऊर्जा इन नौजवानों में फैल रही है। डीजे की धुनों में डिस्को क्लब व पबों में अश्लील गानों पर थिरकते इन युवाओं के क़दम ना जाने कब बहक जाएँ, पता ही नहीं चलता है।
नाइट क्लबों ने इन नौजवानों को गलत दिशा बता दी है। तभी तो झूठी खुशियों की तलाश में इनके कदम डगमगा जाते हैं। युवा वर्ग खुलेआम नशे के मोहपाश में अनमोल ज़िंदगी को खराब कर रहा है। तेज गति यानी रफ्तार का जुनून कहें या शौक़ या नई महंगी कारों को तेज गति में उड़ाने की सनक कहें या पागलपन, जिसके कारण अनेक घरों के चिराग बुझ रहे हैं। इस पाश्चात्य संस्कृति ने पूरे सामाजिक ताने-बाने को मुश्किलों में डाल दिया है। खुलेआम फैशन का तांडव, उसमें भी सामाजिक बुराइयों में शराब व अन्य नशीली चीजों के सेवन में आज का युवा ना जाने क्या सोचता है। परिजन उन्हें समझाते हैं, लेकिन उसे ना जाने क्या समझ में आता है कि वह परिवार वालों को ‘पुरानी सोच वाले’ कह कर दौड़ लगाते हैं, मगर कछुए व खरगोश की कहानी भूल जाते हैं, कि ज्यादा तेज चलने वाला मंजिल को नहीं पा सकता है। जो धीरे-धीरे सोच-समझकर जीवन में आगे बढ़ते हैं, वही नाम रोशन करते हैं, किन्तु जवानी की दहलीज पर खड़ा युवा वर्ग भ्रमित हो रहा है। ऐसे में भटके हुए युवा वर्ग को सही राह दिखाने वालों की जरूरत है।
पहले और अब में परिवारों में रिश्तों का मतलब ही धूमिल हो रहा है। चारदीवारी व भागम-भाग में मनुष्य अपने बच्चों-परिजनों के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं। यह बहुत बड़ी विडम्बना ही है। छोटे शहरों व गाँवों से बच्चे बड़े-बड़े शहरों व महानगरों में अपने भविष्य को तलाशने के लिए ना जाने कब गलत संगत या आजकल के पाश्चात्य वाले मकड़जाल में घिर जाते हैं, कि उनका निकलना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि परिवार छोटे हो गए हैं, बड़े-बुजुर्गों से दूरी वर्तमान समय में बहुत गलत बात है। पहले अगर हम गलत संगत में जाते थे, तो वे उनके अनुभव से हमें सही दिशा में ले जाते हैं। बड़े- बुजुर्ग अपने परिजनों को बच्चों को रोकते-टोकते थे, जल्दी आना देर से मत आना। उसके उलट आज-कल के माता-पिता या अभिभावक बच्चों के प्रति लापरवाह हो गए हैं, क्योंकि वह भी समय के अनुरूप हाई-फाई सोसायटी के साथी बने हुए हैं। वह इसे गलत नहीं समझते हैं, जबकि अपने घरों से दूर खुली छूट एवं विश्वास का गलत फायदा उठाने वाली युवा पीढ़ी दलदल में फंसती जा रही है। तभी तो अल्प समय में घरों के चिराग बुझ रहे हैं। पिता अपने बच्चे को कन्धा दे रहे हैं, इससे दुखद क्या हो सकता है।