कुल पृष्ठ दर्शन :

प्रतिदिन हो संकल्प का अभिनंदन

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

*************************************************

‘स्वागत, संकल्प, संघर्ष और सफलता’ (नववर्ष २०२६ विशेष)….

नववर्ष का स्वागत हम प्रायः एक तिथि, एक रात, कुछ शुभकामनाओं और उत्सवों तक सीमित कर देते हैं, परंतु क्या परिवर्तन सचमुच केवल कैलेंडर के पलटने से होता है ? वास्तविक नववर्ष तब जन्म लेता है, जब हमारी चेतना हर श्वांस के साथ नवीन संकल्पों से सजती है, जब हमारा हर कदम आत्मोन्नति की दिशा में बढ़ता है। नववर्ष कोई एक दिन नहीं, बल्कि जीवन की सतत साधना है।
मनुष्य का जीवन क्षणभंगुर है। जो बीत गया वह स्मृति है, जो आने वाला है वह संभावना है। इन दोनों के बीच का जो पल है, वही सृजन का द्वार है। यदि हम हर क्षण को नव मानकर जीना सीख लें, तो अतीत की थकान और असफलताओं का बोझ स्वतः उतरने लगता है। तब हर प्रभात केवल सूर्योदय नहीं रहता, वह आत्मजागरण का उत्सव बन जाता है।
नववर्ष का वास्तविक अभिनंदन बाहरी सजावट से नहीं, भीतर के संस्कारों से होता है। जब हम अपने विचारों को नकारात्मकता से मुक्त करते हैं, जब लोभ, क्रोध और अहंकार को त्याग कर करुणा, संयम और सेवा को अपनाते हैं, तभी जीवन में सच्चा नवत्व उतरता है। तब कर्म पूजा बन जाते हैं और श्रम साधना।
आज समाज अनेक चुनौतियों से घिरा है-असमानता, वैमनस्य, असंवेदनशीलता और नैतिक शिथिलता। ऐसे समय में प्रत्येक व्यक्ति का प्रतिदिन का नवसंकल्प राष्ट्र-निर्माण की ईंट बन सकता है। ईमानदारी से किया गया छोटा-सा कार्य भी व्यापक परिवर्तन की शुरुआत है।
आइए, हम संकल्प लें कि नववर्ष केवल शुभकामना का शब्द नहीं रहेगा, वह हमारे आचरण की पहचान बनेगा। हमारी हर श्वांस नव आशा से भरी होगी, हर कदम मानवता की ओर बढ़ेगा और हर दिन, हर क्षण, जीवन स्वयं कहेगा-आज भी नववर्ष है, आज भी अभिनंदन का पर्व है।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥