फितूर न पाल

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ममता तिवारी ‘ममता’
जांजगीर-चाम्पा(छत्तीसगढ़)
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अगर ठहरो जरा सा तो बहारें आती है मिलने,
उजाड़ा था खिजाँ देखो वही गुलशन लगा खिलने।

बहाने लाख थमने के चले वो जिंदगी होती,
रुका है वक्त कब ये सोच कर अब दिन लगा ढलने।

सहारा खुद बना खुद का उसे फिर गम नहीं होता,
करारा ही बना रहता नहीं देता नमी सिलने।

भरोसा इक बीमारी है इसे हम तोड़ ही डालें,
ये जो उम्मीद होती है वही आती हमें छलने।

गंवाते कीमती सुख-चैन कागज और पत्थर पर,
फटा कागज लुटा पत्थर लगे अब हाथ क्यों मलने।

नहीं दरकार रातें चाँदनी से ही नहाई हो,
बहुत काफी चमक जुगनू अँधेरी रात में चलने।

जरूरी कुछ नहीं होता फितूर न पाल ए ‘ममता’,
सनक-दीवानगी अच्छी नहीं होती कहा दिल ने॥

परिचय–ममता तिवारी का जन्म १अक्टूबर १९६८ को हुआ है। वर्तमान में आप छत्तीसगढ़ स्थित बी.डी. महन्त उपनगर (जिला जांजगीर-चाम्पा)में निवासरत हैं। हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाली श्रीमती तिवारी एम.ए. तक शिक्षित होकर समाज में जिलाध्यक्ष हैं। इनकी लेखन विधा-काव्य(कविता ,छंद,ग़ज़ल) है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैं। पुरस्कार की बात की जाए तो प्रांतीय समाज सम्मेलन में सम्मान,ऑनलाइन स्पर्धाओं में प्रशस्ति-पत्र आदि हासिल किए हैं। ममता तिवारी की लेखनी का उद्देश्य अपने समय का सदुपयोग और लेखन शौक को पूरा करना है।

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