डॉ. शैलेश शुक्ला
बेल्लारी (कर्नाटक)
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डिजिटल मीडिया का युग मूलतः ‘गति’ का युग है-खबरें सेकंडों में फैलती हैं, प्रतिक्रियाएँ मिनटों में बनती हैं, और जनमत कई बार घंटे भर में दिशा बदल लेता है। इसी तेज़ रफ्तार के बीच अब एक नई शक्ति निर्णायक बनकर उभरी है-कृत्रिम मेधा के सहारे बनी सामग्री, खासकर ‘डीपफेक’ और सिंथेटिक वीडियो-ऑडियो। यह वह तकनीक है, जो किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज़, हाव-भाव और संदर्भ इस तरह गढ़ सकती है कि सामान्य नागरिक के लिए असली-नकली की पहचान कठिन हो जाए। नतीजा केवल ‘फर्जी खबर’ तक सीमित नहीं रहता;यह सामाजिक विश्वास, राजनीतिक स्थिरता, चुनावी नैतिकता और मीडिया की विश्वसनीयता-चारों पर हमला करता है। ठीक इसी पृष्ठभूमि में भारत ने फरवरी २०२६ में सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत एआई-जनित/बदली गई सामग्री के लिए कड़े अनुपालन उपाय लागू किए हैं, जिनमें सबसे अधिक चर्चा “३ घंटे के भीतर अवैध सामग्री हटाने” जैसी समय-सीमा की हो रही है।
इस नीति-परिवर्तन को केवल तकनीकी नियम न समझना चाहिए। यह भारत के डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र का नया अनुशासन है-और साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों के लिए एक नई कसौटी भी। सवाल यह नहीं है, कि डीपफेक को रोका जाए या नहीं; सवाल यह है कि उसे रोकने के तरीके ‘लोकतांत्रिक’ रहेंगे या ‘अति-नियमन’ में बदलकर वैध पत्रकारिता, आलोचना और बहस को भी नुकसान पहुँचा देंगे।
आज डीपफेक और एआई-जनित गलत सूचना का खतरा इसलिए बड़ा है क्योंकि यह ‘स्केल’ पर काम करता है। पहले किसी झूठी कहानी को फैलाने के लिए बड़ी मंडली, समय और संसाधन लगते थे; अब कम संसाधन वाला व्यक्ति भी ‘एआई’ उपकरणों से बड़ी मात्रा में नकली वीडियो क्लिप, नकली ऑडियो बाइट और नकली चित्र तैयार कर सकता है। विश्व आर्थिक मंच की ‘ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट २०२५’ के प्रेस-सार में ‘गलत सूचना और भ्रामक सूचना’ को लगातार दूसरे वर्ष अल्पकालिक जोखिमों में सबसे ऊपर रखा गया है, और यह भी बताया गया है कि यह सामाजिक एकजुटता तथा शासन पर भरोसा कमजोर करती है। यानी दुनिया के नीति-विशेषज्ञों की सामूहिक चिंता यही है कि सूचना-प्रदूषण अब केवल मीडिया की समस्या नहीं रहा; यह ‘लोकतंत्र के संचालन’ की समस्या बन गया है।भारत में यह खतरा और जटिल हो जाता है, क्योंकि यहाँ डिजिटल उपयोगकर्ताओं की संख्या विशाल है, भाषाएँ अनेक हैं, और राजनीतिक-सामाजिक विविधता बहुत गहरी है। एक गलत वीडियो किसी भी समुदाय, किसी भी क्षेत्र, किसी भी भाषा-समूह में तनाव पैदा कर सकता है। इसी वजह से सरकारें तेज़ कार्रवाई चाहती हैं, ताकि नुकसान होने से पहले सामग्री या विषय वस्तु (कंटेंट) हट जाए।
फरवरी २०२६ के संशोधनों का केंद्रीय विचार यह है कि मध्यस्थ मंचों पर ‘सिंथेटिक रूप से उत्पन्न’ या ‘बदली हुई’ सामग्री के दुरूपयोग से होने वाली हानि को कम किया जाए। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के दस्तावेज़ में कहा गया है कि ये संशोधन विशेष रूप से ऐसे सिंथेटिक कंटेंट के बढ़ते दुरूपयोग-डीपफेक, गलत सूचना और अन्य गैरकानूनी सामग्री से उत्पन्न चुनौतियों को ध्यान में रखकर किए गए हैं। यानी अब किसी प्राधिकृत सूचना-निर्देश के बाद मंचों को बेहद कम समय में निर्णय लेकर कार्रवाई करनी होगी।
यहाँ बहस का दूसरा पक्ष आता है-क्या ३ घंटे में निष्पक्ष और सटीक निर्णय संभव है ? मेटा ने ‘ऑपरेशनल चुनौतियों’ की बात कही-यानी इतने कम समय में सामग्री की पहचान, संदर्भ समझ, सत्यापन और हटाने की प्रक्रिया लागू करना कठिन हो सकता है। यह आपत्ति केवल सुविधा की नहीं है; यह ‘गलत निर्णय’ के जोखिम से जुड़ी है, क्योंकि यदि मंच दंड या कानूनी जोखिम से बचने के लिए अति सावधानी बरतेगा, तो वह संदिग्ध लगने वाली बहुत-सी वैध सामग्री भी हटा सकता है। इसका सीधा असर पत्रकारिता, व्यंग्य, राजनीतिक आलोचना और नागरिक आवाज़ों पर पड़ेगा।
मीडिया के लिए दुविधा है कि मीडिया का काम केवल सूचना देना नहीं, बल्कि सत्ता, संस्थाओं और समाज की जवाबदेही तय करना भी है। डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर यदि हटाने का दबाव बढ़ेगा, तो ‘जरूरत से ज्यादा हटाने’ की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, क्योंकि बहस की जगह सिकुड़ती है। दूसरी तरफ, अगर डीपफेक और एआई-जनित झूठ को खुला छोड़ दिया जाए तो नुकसान बहुत बड़ा हो सकता है-चुनावी ध्रुवीकरण, हिंसा भड़कना, या किसी व्यक्ति-समूह की प्रतिष्ठा पर स्थायी चोट। यहाँ सबसे जरूरी है ‘प्रक्रियात्मक न्याय’-यानी हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी हो, कारण बताए जाएँ, और अपील-पुनरावलोकन की व्यवस्था हो। वरना किसी सामग्री का हटना जनता के लिए अंतिम सत्य बन जाता है, कि वह ‘गलत’ था, जबकि वह पत्रकारिता-आधारित खुलासा भी हो सकता है। ३ घंटे की समय-सीमा न्यायसंगत तभी बन सकती है, जब उसके साथ मजबूत अपील-प्रक्रिया और त्रुटि-सुधार तंत्र भी समान गति से उपलब्ध हों।
डीपफेक से लड़ाई केवल टेकडाउन से नहीं जीती जा सकती। कारण यह है, कि सामग्री हटने से पहले वह लाखों लोगों तक पहुँच चुकी होती है, और उसका प्रभाव बना रहता है। इसलिए समाज में ‘मीडिया साक्षरता’ और ‘डिजिटल विवेक’ का निर्माण अनिवार्य है। लोग सीखें कि किसी वीडियो पर तुरंत विश्वास न करें, स्रोत देखें, संदर्भ समझें, और सत्यापन की आदत विकसित करें। ‘यूनेस्को’ ने मार्गदर्शन में यह संकेत दिया है कि जनरेटिव एआई से जुड़े जोखिम-जैसे डॉटा गोपनीयता, पक्षपात और संस्थानों की तैयारी-नीतिगत बहस से तेज़ी से आगे निकल चुके हैं; इसलिए मानव केंद्रित दृष्टि और क्षमता-निर्माण की जरूरत है। यदि शिक्षा-संस्थानों और नागरिकों को सत्यापन कौशल नहीं सिखाया जाएगा, तो डीपफेक का बाजार बना रहेगा, क्योंकि मांग बनी रहेगी।
राजनीति में डीपफेक का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह ‘विश्वास’ पर हमला करता है। एक नकली वीडियो किसी नेता को ऐसी बात कहते दिखा सकता है, जो उसने कही ही नहीं। चुनावी समय में यह कुछ घंटों में माहौल बदल सकता है। बाद में खंडन आए भी, तो ‘पहला प्रभाव’ बहुत बार वापस नहीं जाता। यही कारण है, कि सरकारें तेज़ टेकडाउन चाहती हैं। राजनीति में ही यह खतरा भी है कि ‘अवैध’ या ‘हानिकारक’ की व्याख्या बहुत विस्तृत हो जाए, और राजनीतिक असहमति को भी उसी तराजू पर तोला जाने लगे। इसलिए, नियमों का इस्तेमाल ‘सार्वजनिक हित’ में ही सीमित रहना चाहिए, न कि असहमति दबाने के साधन के रूप में।
आज के डिजिटल युग में नीति निर्माण का लक्ष्य तीन चीजों का संतुलन होना चाहिए:सुरक्षा, स्वतंत्रता और सत्य। इसके लिए कुछ व्यावहारिक कदम निर्णायक हैं, पहला-स्पष्ट परिभाषाएँ और सीमाएँ। किसे डीपफेक माना जाएगा, किसे व्यंग्य, किसे समाचार-क्लिप, यह स्पष्ट होना चाहिए। अस्पष्टता बढ़ेगी तो गलत हटाने के प्रयास बढ़ेंगे। दूसरा-तेज़ अपील और पारदर्शिता। यदि ३ घंटे में हटाना है, तो उतनी ही तेज़ और प्रभावी अपील-पुनरावलोकन भी होना चाहिए, ताकि वैध सामग्री जल्दी बहाल हो सके। तीसरा- तकनीकी प्रमाण-आधारित उपाय। केवल हटाना पर्याप्त नहीं; ‘सामग्री की उत्पत्ति’ का प्रमाण, सत्यापन-चिन्ह और विश्वसनीय स्रोत-संकेत जैसी प्रणालियाँ विकसित करनी होंगी। चौथा- बहुभाषी मॉडरेशन क्षमता। भारत में भाषा-विविधता के कारण संदर्भ-समझ बेहद जरूरी है; नहीं तो छोटे भाषाई समुदायों की वैध सामग्री ज्यादा प्रभावित होगी। पाँचवाँ-मीडिया साक्षरता का राष्ट्रीय अभियान। यूनेस्को जैसी संस्थाओं के मार्गदर्शन के अनुरूप विद्यालय-महाविद्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों में सत्यापन शिक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।
भारत के नए नियम एक वास्तविक समस्या का उत्तर हैं-एआई जनित झूठ, डीपफेक और आभासी हानि, लेकिन हर शक्तिशाली उपाय की तरह इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी, कि इसे कैसे लागू किया जाता है। अगर यह नीति पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट परिभाषाओं, तेज़ अपील और तकनीकी सत्यापन के साथ आगे बढ़ेगी, तो यह डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र में विश्वास बहाल करने की दिशा में मजबूत कदम हो सकता है।
आज के भारत के सामने चुनौती यही है-डिजिटल अनुशासन को डिजिटल स्वतंत्रता के साथ जोड़ना। डीपफेक का इलाज जरूरी है, पर इलाज ऐसा हो कि मरीज यानी लोकतांत्रिक बहस कमजोर न पड़ जाए।