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‘भारत रत्न’ डॉ.मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया

संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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‘अभियंता दिवस’ विशेष…

भारतीय मूल के प्रथम अभियंता डॉ. विश्वेश्वरैया की झाँकी भर लें,
याद उन्हें भी कर लें, उनकी भी बातों पर अपने अंदर आहें भर लें।

मैसूर के विलक्षण प्रतिभाशाली मोक्षगुंडम थे अनमोल,
अंग्रेजों ने ही समझ लिया ऐसे अभियंता का मोल।

पढ़ाई ऊँची-शिक्षा ग्रहण करने की बने उनके उसूल,
चिकबल्लापुर (कर्नाटक) जन्म स्थान, पढ़े वो हाई-स्कूल।

बंगलुरू में इंटरमीडिएट शिक्षा मिली छात्र बड़े बहुमूल्य,
पुणे बॉम्बे विश्वविद्यालय अभियंत्रण के सर्वश्रेष्ठ ये फूल।

विद्वान विश्वेश्वरैया के राष्ट्र प्रेरित थे जीवन मूल्य,
भारत को उनके दर्शन चिंतन से विकास मिला अमूल्य।

किंग जॉर्ज ने प्रतिभा का लोहा माना उपाधि दी ‘सर’,
मैसूर, हैदराबाद शहर को दिखाया विकास का असर।

मैसूर की जनता ने उन्हें ‘मैसूर का पिता’ पुकारा,
हैदराबाद को सिटी बनाकर दिखाई जीवनधारा।

९२ वर्ष की आयु, स्वस्थ समर्पित अनुशासन प्रबल सहारा,
इसके बूते ही बन पाए अभियंताओं में ध्रुवतारा।

देश को उन पर गर्व सदा हो, जन्म- जन्म अभिमान,
अभियंता मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया को नमन करें श्रीमान।

भारत के तीव्र विकास का जिसने सपना किया साकार,
ऐसे तपे-तपाए अभियंता को भारत से गहरा प्यार।

जिनके राष्ट्र प्रेम, प्रेरणा, समर्पण से भारत को मिली रफ्तार,
‘भारत रत्न’ से विभूषित आप हैं, करें सादर नमन स्वीकार॥

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएससी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता, रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुंबई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़ें हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। सम्मान-पुरस्कार में आपको महात्मा बुद्ध  सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२० २३ सहित अन्य सम्मान मिले हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले संजय सिंह ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज- पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”