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मनोयुद्ध में सम्पूर्ण विजय प्राप्त करें

मुकेश कुमार मोदी
बीकानेर (राजस्थान)
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इस घोर कलियुग में मानव जीवन महाभारत युद्ध का रूप ले चुका है। प्रतिदिन व्यक्ति अपना जीवन सुखी, समृद्ध और खुशहाल बनाने के लिए मनोयुद्ध रूपी संघर्ष करते हुए विजय का प्रयास करता नजर आता है, किन्तु गलत आधार चुनने के कारण उसे अधिक हार का सामना करना पड़ता है।
सभी जानते हैं कि महाभारत युद्ध में दुर्योधन ने श्रीकृष्ण से उनकी सेना प्राप्त की और अर्जुन ने निहत्थे श्रीकृष्ण को अपना सारथी बनाया। परिणाम कि निहत्थे होते हुए भी श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को जीत दिलाई और दुर्योधन की हार हुई। दुर्योधन की यही भूल थी कि उसने भगवान की तुलना में सेना को महत्व देते हुए भगवान का साथ ठुकरा दिया।
आज लगभग हर व्यक्ति उसी दुर्योधन के मनोभाव का अनुसरण कर रहा है। ईश्वरीय नियमों, मर्यादाओं का उल्लंघन करते हुए वह सांसारिक व भौतिक सम्पदाओं के बल पर जीवन रूपी संग्राम में विजय होना चाहता है। यदि गहराई से सोचा जाए तो ईश्वर की उपेक्षा करके हम भी कौरवों के समान अपने विनाश को ही निमन्त्रण दे रहे हैं। केवल भौतिक सम्पदाओं तक सीमित ना रहते हुए परमात्मा को अपना साथी, सारथी व खिवैया बनाकर जो जीवन रूपी रणक्षेत्र में उतरता है, उसी की विजय होती है।
सांसारिक सुखों का भोग करने की लालसा हमारे भीतर इतनी प्रबल हो चुकी है कि, हम समस्त ईश्वरीय मर्यादाओं रूपी लक्ष्मण रेखा लांघकर अनेक पाप करते हुए ५ विकारों के दुष्प्रभाव से ग्रसित भौतिक सम्पदाओं का लम्बा-चौड़ा साम्राज्य स्थापित करने लग जाते हैं। इतिहास साक्षी है कि दुर्योधन, रावण, सिकन्दर आदि अनेक ने यह मार्ग अपनाने की भूल की और अन्त में पछतावे के सिवाय उनके जीवन में कुछ भी नहीं बचा।
भौतिक सम्पदाओं के आकर्षण में अन्धे होने के कारण सम्पूर्ण सृष्टि के संचालक उस परमात्मा की स्मृति ही हमारी बुद्धि से ओझल हो जाती है। अहंकार में डूबे ऐसे लोग जीवन में चाहे कुछ भी हासिल करें, किन्तु उनकी सर्व प्राप्तियां संदिग्ध ही रहती है। वैभवयुक्त सांसारिक संसाधनों को भोगने की लालसा ही हमसे ईश्वरीय सत्ता की उपेक्षा करवाती है जो जीवन पर्यन्त दु:ख, रोग, सन्ताप, विलाप आदि का अनुभव कराने वाली परिस्थितियों को जन्म देती है।
परमात्मा के प्रति श्रद्धाभाव की शून्यता हमें जीवन की समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए सांसारिक शक्तियों की ओर आकर्षित करती है, जिससे समस्याएं तो समाप्त नहीं होती, किन्तु जीवन से उमंग, उत्साह, मनोबल और आत्मबल अवश्य समाप्त होने लगता है। यदि सम्पूर्ण श्रद्धाभाव से जीवन नैया की पतवार परमात्मा के हाथों में सौंप दी जाए तो मन से भय व संशय समाप्त हो जाएगा। प्रभु प्रेरणा से दिन-प्रतिदिन हमारा चरित्र दिव्य गुणों से भरपूर होता जाएगा।
विश्व नाट्यमंच पर समस्त घटनाएं हमारे ही कर्मों के प्रतिफल स्वरूप निर्धारित समय पर स्वचालित रूप से घटित होती हैं, जिसके लिए कोई और व्यक्ति दोषी नहीं है। इसलिए समस्त विपरीत परिस्थितियों में परमात्म सत्ता पर श्रद्धापूर्वक अटूट व अटल विश्वास ही हमें उनका सामना करने का सम्बल प्रदान करता है। परमात्मा द्वारा अदृश्य सत्ता के रूप में विश्व का संचालन किया जा रहा है। परमात्म प्रेरित सार्वभौमिक आचार संहिता के आधार पर जीवन संचालित करने से ही निर्बन्धन, निर्विघ्न, सफल और सुखद जीवन की परिकल्पना साकार हो सकती है।
सम्पूर्ण विश्व में कर्म की प्रधानता है, कर्म करना मानव धर्म है। कर्मों के आधार पर ही जीवन-यापन के समस्त साधन जुटाए जाते हैं। परमात्म निर्मित वैश्विक आचार संहिता की परिधि में रहकर ईश्वरेच्छा के अनुरूप ही प्रत्येक कर्म करना चाहिए।
श्रीमदभगवत गीता में यही उपदेश दिया गया है कि परमात्मा की इच्छा को ही अपनी इच्छा समझकर कर्म करेंगे तो, अर्जुन समान सम्पूर्ण सफलता मिलेगी। परमात्म इच्छा को प्रधानता देने वाला उसके पावन हृदय में स्थान प्राप्त करने के साथ साथ अपना भौतिक जीवन भी दिव्य, श्रेष्ठ और महान बना सकता है।
विडम्बना है कि, यह सब-कुछ जानते हुए भी हम दुर्योधन की भांति अहंकार का चैतन्य प्रतिरूप बनकर परमात्मा की आज्ञाएं स्वीकार करने को तैयार नहीं, बल्कि अपने मन रूपी बलहीन कन्धों पर दु:ख, अशान्ति के अनेक बोझ उठाए जीवन को घसीटते हुए जी रहे हैं। मन में व्याकुलता चरम पर है, किन्तु उसका समाधान ज्ञात होते हुए भी उसे स्वीकारना नहीं चाहते।
इसलिए, अब हमें सजगतापूर्वक अपना जीवन रूपी रथ परमात्मा के हाथों में सौंपकर विजय यात्रा पर चलने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। सदा यही स्मृति रहे कि, मेरे हृदय रूपी मन्दिर में परमात्मा स्वयं विराजमान है, जो जीवन का संचालन कर रहे हैं। हमारी हर श्वांस और धड़कन उसकी याद, उसके प्यार में सराबोर होनी चाहिए, तभी हम महाभारत रूपी मनोयुद्ध में सम्पूर्ण विजय प्राप्त कर सफल जीवन की परिकल्पना को साकार कर सकेंगे।

परिचय – मुकेश कुमार मोदी का स्थाई निवास बीकानेर में है। १६ दिसम्बर १९७३ को संगरिया (राजस्थान)में जन्मे मुकेश मोदी को हिंदी व अंग्रेजी भाषा क़ा ज्ञान है। कला के राज्य राजस्थान के वासी श्री मोदी की पूर्ण शिक्षा स्नातक(वाणिज्य) है। आप सत्र न्यायालय में प्रस्तुतकार के पद पर कार्यरत होकर कविता लेखन से अपनी भावना अभिव्यक्त करते हैं। इनकी विशेष उपलब्धि-शब्दांचल राजस्थान की आभासी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त करना है। वेबसाइट पर १०० से अधिक कविताएं प्रदर्शित होने पर सम्मान भी मिला है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-समाज में नैतिक और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करना है। ब्रह्मकुमारीज से प्राप्त आध्यात्मिक शिक्षा आपकी प्रेरणा है, जबकि विशेषज्ञता-हिन्दी टंकण करना है। आपका जीवन लक्ष्य-समाज में आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों की जागृति लाना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-‘हिन्दी एक अतुलनीय, सुमधुर, भावपूर्ण, आध्यात्मिक, सरल और सभ्य भाषा है।’