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महँगा सोना, हल्का रुपया और भारी पड़ती ज़िंदगी

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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कहते हैं, “जब घर की थाली खाली हो, तब तिजोरी का सोना भी बोझ लगने लगता है।” यही बात आज भारत के आम आदमी की सच्चाई बन चुकी है। आम आदमी को कारण कुछ पता नहीं, पर बस यह पता है कि सोना और चाँदी ऐतिहासिक ऊँचाई पर हैं, लेकिन रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और आम आदमी की जेब दिन-ब-दिन हल्की होती जा रही है। कहने का अर्थ यह है कि सोना भले ही बढ़ रहा है, किन्तु यह रोज़मर्रा की आम ज़िंदगी पर सीधा प्रहार है। भले ही फिर इसे बाज़ार का खेल समझा जाए या कुछ और।
२००७ में स्वर्ण धातु का भाव १० हजार ₹ तौला (10 ग्राम) था, तब तक तो इसे सामाजिक परम्परा और सुरक्षित निवेश का प्रतीक माना जाता था, क्योंकि सस्ता ही था और अपने बस की बात थी। शादी-ब्याह, त्योहार या भविष्य की चिंता के हल में यानी हर जगह सोने की अहम भूमिका थी, लेकिन आज हालात यह हैं कि सोना तो ठीक, चाँदी भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो है।
पिछले कुछ वर्षों में सोने की कीमतों में लगभग १००-५०० प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अब सोना अब खरीदने का मन भी हो, तो जेब हाँ नहीं कर पा रही है, तो कभी मध्यम वर्ग की धातु मानी जाने वाली चाँदी ने भी आज आम आदमी से दूरी बना ली है। यानी चाँद जैसे दूर है। इन बढ़ते भावों को हम भले ही देश की अर्थव्यवस्था के लिए तरक्की मानें, मगर सच्चाई और परिणाम यह है कि आज गहनों की खरीद शौक नहीं, मजबूरी में टलने वाला निर्णय बन गई है।
एक और कहावत है, “जिसके पास रोटी नहीं, वह तौलिया नहीं देखता।” कुछ यही हाल आज सोने के साथ है। दोनों धातुओं के बढ़ते भाव केवल ज्वेलरी बाजार की समस्या नहीं हैं। इसका सीधा असर कारीगरों, छोटे व्यापारियों और रोज़गार पर भी पड़ रहा है। कई छोटे ज्वेलर्स की बिक्री में ३०-४० फीसदी गिरावट हुई है। उन्होंने इस वजह से कारीगर भी कम किए हैं।
जहाँ पहले लोग वजन देखकर इनको खरीदते थे, अब “डिज़ाइन दिखाकर बजट में समेटने” की कोशिश हो रही है, क्योंकि खरीदी बूते से बाहर है। आम आदमी के लिए सोना अब निवेश नहीं, सिर्फ़ तस्वीरों और विज्ञापनों की चीज़ बनता जा रहा है।
अब बात करें रुपए के अवमूल्यन यानी नीचे जाने की, तो इसकी असली जड़ समझिए। इस पूरी समस्या की जड़ कहीं और है।
कुछ साल पहले जहाँ डॉलर के मुकाबले रुपया अपेक्षाकृत मजबूत था, आज वही रुपया लगातार फिसल रहा है। कमजोर रुपया मतलब-आयात महँगा, कच्चा माल महँगा, ईधन महँगा और अंततः रोज़मर्रा की ज़िंदगी महँगी होना है।
सरल भाषा में बोलें तो ‘सोने की चिड़िया’ कहलाने वाला भारत सोने का बड़ा आयातक है, इसलिए जैसे-जैसे रुपया कमजोर होता है, वैसे-वैसे सोना अपने-आप महँगा हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि “रुपया इतना हल्का हो गया है कि महंगाई उस पर बैठकर सफर कर रही है।”
ऊपर से महंगाई का असर सिर्फ़ सोने-चाँदी तक सीमित नहीं है। दूध, दाल, सब्ज़ी, दवाई, गैस सिलेंडर और विद्यालय फीस जैसे हर मोर्चे पर आम आदमी बड़े दबाव में है, कारण कि आय तो वही है, लेकिन खर्च कई गुना तेज़ी से बढ़ रहा है।
इन धातुओं के किसी राक्षस की तरह बढ़ते ही जाने से एक आम परिवार की मासिक ज़रूरतें पिछले एक-डेढ़ दशक में लगभग दोगुनी हो चुकी हैं, जबकि आमदनी में वह अनुपात नहीं दिखता है। नतीजा यह कि बचत भी शून्य के करीब पहुँचती जा रही है, क्योंकि यह तो सबसे आख़िरी काम है। सीधी सी बात है कि “कमाई रेंग रही है और खर्च दौड़ रहा है।”
अक्सर सरकार द्वारा नीतिगत स्तर पर दावा किया जाता है कि अर्थव्यवस्था मज़बूत है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे अलग कहानी कहती है। जब रुपया कमजोर है और महंगाई अधिक है, तब उसका सबसे पहला और सबसे बड़ा बोझ आम आदमी ही उठाता है। सोने व चाँदी के दाम बढ़ने पर सरकार को तो ‘कर’ से लाभ होता है, मगर आम आदमी के लिए यह केवल एक और बंद दरवाज़ा बन जाता है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह है, कि अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में मध्यम वर्ग की ‘बचत संस्कृति’ का क्या होगा ?
जो वर्ग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, वही वर्ग आज सबसे ज़्यादा पिसा रहा है। अमीर को कोई फर्क नहीं पड़ना है, और पड़ता भी कब ही है ? स्थिति यह है, कि लोग सोना लेने के सपने नहीं देख रहे, बल्कि कर्ज़ से बचने की दुआ कर रहे हैं।
.कुल मिलाकर सोना-चाँदी महँगा होना सिर्फ़ बाज़ार की खबर नहीं, यह आम आदमी की विवशता बनाम असहायता की कहानी है। कमजोर ₹, बढ़ती महंगाई और स्थिर आमदनी-इन तीनों ने मिलकर आम ज़िंदगी को भारी यानी महंगा बना दिया है, जिस पर सरकार को तत्काल नियंत्रण करना चाहिए, वरना चाँद जैसी चाँदी ज़ब बहुत ऊपर नहीं ख़रीदे जाने की हालत में नीचे गिरेगी, तो बहुत कुछ उथल-पुथल मचाएगी, जिसका असर सबको ही सहना होगा। सरकार अभी चेत जाए तो अच्छा है, वरना आम आदमी यही बोलेगा, “जब सिक्का चमकने लगे और जेब खाली हो जाए, तब समझ लीजिए व्यवस्था किसी और के लिए काम कर रही है।”