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माँ का सफर

ताराचन्द वर्मा ‘डाबला’
अलवर(राजस्थान)
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मेरी माँ घर में सबसे बड़ी थी,
हर मुश्किल में साथ खड़ी थी
वर्षों बीत गए पिता को गुजरे,
वो बेचारी गरीबी से लड़ी थी।

पिताजी के होते कोई ग़म न था,
अब माँ के सिर भार कम न था
बखूबी निभा रही थी जिम्मेदारी,
शायद नियति को ये मंज़ूर न था।

घोर संकट अब घिर आया था,
घर में कर्जे का मातम छाया था
माँ को चिंता खाए जा रही थी,
हल कुछ नजर नहीं आया था।

तभी एक भाई को व्याधि ने घेरा,
माँ बार-बार लगा रही थी फेरा
मिलने की भरपूर थी कोशिश,
हृदय भीतर चमक रहा था चेहरा।

विरह की पीड़ा सता रही थी,
नियति भी आँखें गडा रही थी
बस एक झलक देख लूं उसको,
माँ की ममता फड़फड़ा रही थी।

मर्म स्पंदन उसका बढ़ गया था,
बी.पी. हद से ज्यादा हो गया था
माँ ही तो थी कैसे सहन कर पाती,
विश्वास धीरे-धीरे खत्म हो गया था।

भाई के स्वास्थ्य में तो सुधार आया,
पर माँ को जाने क्या ख्याल आया
एकदम से गिरी धड़ाम जमीं पर,
जैसे कोई भयंकर तूफान आया।

एक पल के लिए सन्नाटा छाया,
किसी को कुछ समझ न आया
खाना लेकर आई थी करिश्मा,
लेकिन एक निवाला न खाया।

फिर अचानक रुकने लगी साँस,
सभी आ गए थे मेरी माँ के पास
शायद अब बुलावा आ गया था,
बचने की नहीं थी बिल्कुल आस।

मैंने शीघ्र गाड़ी वाले को फोन किया,
दोनों हाथ ईश्वर के आगे जोड़ दिया।
हार गई जंग, मौत से लड़ते-लड़ते,
माँ ने बीच रास्ते में दम तोड दिया॥

परिचय- ताराचंद वर्मा का निवास अलवर (राजस्थान) में है। साहित्यिक क्षेत्र में ‘डाबला’ उपनाम से प्रसिद्ध श्री वर्मा पेशे से शिक्षक हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कहानी,कविताएं एवं आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आप सतत लेखन में सक्रिय हैं।

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