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मिट्टी और मानव

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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श्रम से मिट्टी खोद कर, ढोता है वो भार।
लाकर उसको रोंदता, देता है आकार॥

दीप,सुराही,घट घड़े, होते विविध प्रकार।
कुम्भकार निज कर्म को, करता है साकार॥

ठोक बजा कर देखते, कुछ घट होते खास।
जिसमें शीतल जल रहे, वही बुझाए प्यास॥

मिट्टी से मानव बना, सब मिट्टी का खेल,
मानव मिट्टी का रहा, आदिकाल से मेल॥

इस मिट्टी में लोट कर, बचपन हुआ जवान।
मिट्टी से बनते सभी, बिल्डिंग और मकान॥

मिट्टी सब शीतल करे, मानव तन वा नीर।
जले चिता में हड्डियाँ, मिट्टी बने शरीर॥

मिट्टी से चूल्हा बने, जिस पर बनता भोज।
जल शीतल घट में रहे, पीता मानव रोज॥

मिट्टी से दीपक बने, करते दूर अँधियार।
अवली दीपों की सजे, दीपावलि त्योहार॥

मिट्टी के घट काम लो, छोड़ो फ्रिज का ध्यान।
बीमारी पैदा करें, कहते लोग सुजान॥

परिचय–शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है

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