ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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मेरा कान्हा तो है गुलाब का फूल,
देखो जब उसके मुख सृष्टि समूल।
कान्हा जैसा प्यारा कोई नहीं है,
सबके कष्टों को तो सुनता वही है।
उसकी प्यारी बाँसुरी की वो धुन,
जो भी सुनता हो जाता है मुग्ध।
जब वो माखन लिपटाए अपने मुख,
देख यशोदा मैया को अपार मिले सुख।
गैया चराए मेरा नन्हा-सा कान्हा,
सबका मसीहा तो है मेरा कान्हा।
कान्हा से मिलने देवता गण है आते,
भेष बदलकर कान्हा से है बतियाते।
उन्हें मिटाने को असुर भी है आते,
कान्हा को छोड़ खुद ही है मिट जाते।
गोपियों के संग कान्हा रास रचाते,
ग्वालों के कान्हा तो प्राण बन जाते।
राधा के कान्हा मगन हो बाँसुरी बजाते,
उनके हृदय में बस कृष्ण ही तो बसते।
धुन को सुन राधा पुलकित हो जाती,
जैसे कि राधा सुध-बुध ही खो जाती।
कान्हा ने किया जब कालिया सिर नृत्य,
परिवार सहित भागा, किया बंधन मुक्त।
मेरा कान्हा तो है सबका ही प्यारा,
यशोदा मैया की आँखों का तारा॥