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मेरे दोस्त

संजय एम. वासनिक
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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मित्रता और जीवन….

 

तुम मिले किसी अनजान की तरह…,
भटके राही को मंज़िल की तरह…
और जिंदगी का हिस्सा बन गए…,
क्या हुआ कि तुम कहीं गुम हो गए…।

दुआ करता हूँ, तुम मिलोगे फिर…,
कही किसी जिंदगी के मोड़ पर…
जहां दोस्त मिलकर बिछड़ते नहीं…,
जहां दोस्ती का अंत होता नहीं…।

नहीं मानता कि मैं कोई किस्सा हूँ…,
या जिंदगी का कोई अहम हिस्सा हूँ…
ना ही है मेरा कोई विशेष स्थान…,
जिंदगी में तुम्हारी, मैं एक अनजान
पर मेरे दोस्त…,
जब कभी सुन लो मेरा नाम…
बस एक ही तमन्ना है मेरी…,
जब भी कभी याद आए मेरी…
तो खुद-ब-खुद लबों पर तुम्हारे…,
प्यारी-सी मुस्कुराहट तैरे…।

बिखर जाए वो फिजां में सारी…,
खुशबू मुस्कुराहट की तुम्हारी…
और होंठ बुदबुदाए हौले से,
कोई क्यों मिले थे भूल से
हाँ, यही है मेरा यार, मेरा दोस्त…,
बस इतना ही कहना है मेरे दोस्त…।

के बेइंतेहा चाहते हैं तुम्हें…,
खोना नहीं था कभी तुम्हें…
पर ना जाने तुम कहाँ खो गए…,
बदहवास-सा मुझे छोड़ गए…।
वो चाहत कभी भुला ना देना…,
दोस्ती हमारी कभी भुला ना देना…॥

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