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मेहरबानी आपकी

सरफ़राज़ हुसैन ‘फ़राज़’
मुरादाबाद (उत्तरप्रदेश) 
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चाँद बन कर आप आए मेहरबानी आपकी।
आ के मेरे दिल पे छाए मेहरबानी आपकी।

किस क़दर बेनूर लगती थी मुझे हर शामे ग़म।
तीरगी में लड़खड़ाते थे मिरे अकसर क़दम।
नूर बन कर आप आए मेहरबानी आपकी।
आ के मेरे दिल पे छाए मेहरबानी आपकी॥

कितना तड़पाती थीं दिल को शब की ये तन्हाईयाँ।
नींद में भी आती रहती थीं मुझे अँगड़ाईयाँ।
ख़्वाब बन कर आप आए मेहरबानी आपकी।
आ के मेरे दिल पे छाए मेहरबानी आपकी॥

हर घड़ी बेचैन रहते थे मिरे क़ल्ब ओ जिगर।
रोते-रोते ही गुज़रते थे मिरे आठों पहर।
चैन बन कर आप आए मेहरबानी आपकी।
आ के मेरे दिल पे छाए मेहरबानी आपकी॥

चाँद बन कर आप आए मेहरबानी आपकी।
आ के मेरे दिल पे छाए मेहरबानी आपकी॥