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रिक्त हो गया सुर संसार

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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सुरों की अमर ‘लता’ विशेष-श्रद्धांजलि…

ख़ामोश हो गई सरगम सारी टूट गए वीणा के तार,
स्तब्ध हुई दुनिया सारी औ रिक्त हो गया सुर संसार।
देख रहे निर्लिप्त नयन इक रत्न अमोलक का जाना,
भारत की शान विभूति महान सारे जग ने जिसको माना।
संगीत जगत का सूर्य सितारा नभ से देखो टूट गया,
वो स्वर कोकिल का मधुर गान कानों से जैसे रूठ गया।
स्वर साम्राज्ञी कोकिल कंठी ले गई संग अपने बहार,
स्तब्ध हुई दुनिया सारी औ रिक्त हो गया सुर संसार…॥

रूठ गई माँ सरस्वती भी युगों-युगों तक साथ निभा,
चली गई तुम साथ छोड़ कर साथ हमारे हुआ दग़ा।
वो आर्द्र करुण स्वर जब जब भी गीतों में तेरे ढलते थे,
होते अवरुद्ध कंठ सारे आँखों से आँसू बहते थे।
हम और कहाँ से लायेंगे अब लता और वो पुरबहार,
स्तब्ध हुई दुनिया सारी औ रिक्त हो गया सुर संसार…॥

सृष्टि के अंतिम दिन तक भी गूँजेंगे गीत तुम्हारे सब,
तुमको माँ शारद माना है हम भूल तुम्हें पाएंगे कब।
तुम अमर सितारा बनकर के चमकोगी नीले अंबर से,
हम नीर नयन में भर कर के,देखेंगे इस जग गह्वर से।
फिर से अवतरण तुम्हारा हो भारत भू पर ही बार- बार,
स्तब्ध हुई दुनिया सारी औ रिक्त हो गया सुर संसार…॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है

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