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लहू से लिखा गया लोकतंत्र

कमलेकर नागेश्वर राव ‘कमल’,
हैदराबाद (तेलंगाना)
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ढाका की गलियों में उठी जो आग,
वह क्रोध नहीं-सत्ता का नाग
एक शहर नहीं, चेतना जली,
लोकतंत्र की आत्मा छलनी हुई।

सवाल पूछना बना अपराध,
सच बोलना देशद्रोह का स्वाद
कानून खड़ा है आँखें मूंद,
हाथों में सत्ता, दिल में क्रूरता की धुंध।

धर्म ने ओढ़ा नफ़रत का जाल,
राजनीति ने खोया नैतिक भाल
ईश्वर का नाम हथियार बना,
मानवता का क़त्ल सरेआम हुआ।

अख़बारों में सिसकती कलम,
पत्रकारों पर बैठा भय का तम
जो लिखे सच, वही अपराधी,
यह कैसी व्यवस्था, कैसी आज़ादी ?

दीपू दास-एक नाम नहीं,
यह व्यवस्था पर लगा सवाल यहीं,
उसके संग जो युवा गिरे,
वे सपने थे, जो ताबूतों में सिमटे पड़े।

माँ की गोद सूनी रह गई,
भविष्य की राह लहू में बह गई
जिन हाथों ने रक्षा की क़सम खाई,
उन्हीं हाथों ने जवानी मिटाई।

यह शासन नहीं, दुरहंकार है,
शवों पर टिकी सत्ता की सरकार है।
जहाँ सत्ता स्वयं न्याय बने,
वहाँ न्याय सबसे पहले मरे।

सरहदें नक़्शे की लकीर सही,
पर आग को रोक सकीं क्या कभी ?
आज ढाका, कल कोई और,
यह चिंगारी, बचेगा न कौन ?

जो देखे और चुप रह जाए,
वह निर्दोष नहीं, अपराध बढ़ाए
मौन यहाँ सुरक्षा का कवच नहीं,
यह इतिहास से की गई बेईमानी।

शांति भाषणों से नहीं आएगी,
न्याय नारों से नहीं मुस्काएगा
जब नागरिक खड़ा सवाल करेगा,
तभी यह अंधकार पीछे हटेगा।

याद रखना-लोकतंत्र किताब नहीं,
यह हर दिन दी जाने वाली क़ुर्बानी।
वरना यह युग कहलाएगा,
लहू से लिखा गया लोकतंत्र, कहानी॥

परिचय – कवि व अनुवादक कमलेकर नागेश्वर राव का साहित्यिक उपनाम ‘कमल’ है। आप सरकारी अध्यापक (हिंदी) ने रूप में जिला नागर कर्नूल के वेल्दंडा में कार्यरत हैं। तेलंगाना राज्य के रंगा रेड्डी जिले में निवासरत ‘कमल’ की तेलुगू और हिंदी के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ व विशेष आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। इनको श्री श्री कला वेदिका राजमंड्री वालों से ‘साहिती मित्रा’ पुरस्कार, आदित्य संस्कृति (मप्र) से ‘हिंदी सेवी’ तथा डाॅ.सीता किशोर खरे स्मारक साहित्य पुरस्कार आदि मिले हैं।