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विचलित हूँ

संदीप धीमान 
चमोली (उत्तराखंड)
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विचलित हूँ विचरण पथ पे
अंतःकरण में होता सोर,
उर दौड रहा अचरज रथ पे
धूमिल राह मेरी हर ओर।

मानो तो जैसे कोहरा
गर्जन हो बादल-सा सोर,
योग-भोग के मध्य तर्जन
टकरा अर्जन उर्जा घनघोर।

हूँ उत्पीड़न में, या मैं व्याकुल
वशीभूत हूँ या मैं हूँ आतुर,
किसी गति में हूँ या हूँ गत में
वर्णित नहीं उर मेरी ठोर।

अंतर्मन ओझिल बोझिल
राह है पर‌ राह नहीं,
झूठ क़दम हो या सत पे
मंथन धूमिल हो पथ पे।

उर उत्सर्जन योग की ध्वनि,
मस्तिष्क खिंचे भोग की ओर।
चीख रहा अंतर्मन मेरा,
पाटन मध्य कणक-सा सोर॥

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