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शिक्षा ने बनाया ‘रामबोला’ को गुरु ‘कालिदास’

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
बीकानेर(राजस्थान)
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महाकवि कालिदास जी के जन्म व परिवार से सम्बन्धित किसी भी प्रकार की प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, परन्तु उनको मानने वाले अधिकांश में से कुछ कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तो कुछ द्वादशी तिथि को इनकी जयन्ती मनाते हैं। इसी अनुरूप एक रोचक तथ्य कि ‘रामबोला’ से ‘कालिदास’ कैसे बने-उस समय के ‘राजा शारदानन्द’ की विदुषी राजकुमारी विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि जो उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा, वे उसी के साथ शादी कर लेंगी। इसी क्रम में उसने अनेक पण्डितों को पराजित किया। यहाँ तक कि काशी के अनेक प्रकांड विद्वानों को राजकुमारी ने शास्त्रार्थ में हरा दिया था। विदुषी विद्योत्तमा से शास्त्रार्थ में पराजित व अपमानित पण्डित उससे बदला लेने के उदेश्य से एक ऐसे पात्र को खोज ही रहे थे कि, जंगल में कालिदास जी पेड़ की डाल पर बैठे दिखाई दिए। आश्चर्य इस बात का था कि वे जिस टहनी पर बैठे थे, उसी को बिना परिणाम जाने काट रहे थे। इससे यह स्पष्ट हो गया कि ये अनपढ़ और निपट मूर्ख थे, बल्कि यों कहिए कि बुद्धि की दृष्टि से शून्य अर्थात उन्हें चीजों की समझ ही नहीं थी। इनके इस कृत्य ने उन सभी को आकर्षित किया। फलतः अपमानित पण्डितों को अपने षड्यन्त्र रचने के लिए ये श्रेष्ठ पात्र लगे। इसलिए उन सभी पराजितों ने मिलकर छल से कालिदास जी से विदुषी का मौन शब्दावली में शास्त्रार्थ करवा कर विवाह करवा दिया। इसके बाद जब वास्तविकता सामने आई, तब विदुषी राजकुमारी ने इनको न केवल धिक्कारा, बल्कि यह कह कर घर से निकाल दिया कि “सच्चे विद्वान् बने बिना घर वापिस नहीं आना।” इसके बाद कालिदास जी ने तन-मन से समर्पित हो अर्थात पूरी लगन तथा परिश्रम से, सच्चे मन से माँ काली देवी की आराधना की। उनके आशीर्वाद फलस्वरूप वे ज्ञानी भी बने और धनवान भी, साथ ही साथ उस दिन के बाद से ही वे कालिदास के नाम से सर्वत्र जाने लगे। इस प्रकार उनके ज्ञान चक्षु खुल जाने से उन्होंने न केवल अनेक स्थानों का भ्रमण किया, बल्कि वेद-शास्त्रों का गहन अध्ययन करके विद्वता प्राप्त की। पश्चात जब घर लौटे तो पत्नी ने संस्कृत में प्रश्न पूछा और उत्तर में उस प्रश्न में उपयोग किए शब्दों से प्रारंभ कर ३ महाकाव्य ‘कुमार सम्भव’, खण्डकाव्य ‘मेघदूत’ व महाकाव्य ‘रघुवंश’ सृजित कर पत्नी विद्योत्तमा को चमत्कृत कर दिया। चूँकि, उन्हें पत्नी के धुत्कारने के बाद परम ज्ञान की प्राप्ति हुई, इसलिए ऐसा माना जाता है कि कालिदास जी ने विद्योत्तमा को पत्नी न मान अपना पथप्रदर्शक गुरु माना।
ऐसा पढ़ने में आता है कि, इन्होंने छोटी-बड़ी लगभग ४० रचनाएं सृजित की हैं, लेकिन निर्विवाद रूप से ७ तो कालिदास कृत ही मानी जाती हैं। इसमें ३ संस्कृत नाटक-विक्रमार्वण्यम, मालविकाग्निमित्रम व अभिज्ञानशाकुंतलम हैं।
कविकुल गुरु कालिदास जी ने आदर्शवादी परंपरा के साथ नैतिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए सरल, मधुर व अलंकार युक्त भाषा का प्रयोग करते हुए रचनाएं सृजित की।इनकी रचनाओं में न केवल श्रृंगार रस का विवरण, बल्कि ऋतुओं का विस्तृत वर्णन भी पढ़ने को मिलता है। यही सब कारण रहे, जिसके चलते इनके बाद हुए प्रसिद्ध कवि बाणभट्ट ने इन्हें प्रतिभावान, महाकवि और उच्च कोटि का नाटककार बताकर इनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। अपने समय के दक्षिण वाले शक्तिशाली चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय ने भी अपने एक शिलालेख में कालिदास जी को महान कवि के रूप में दर्शाया हुआ है। आज तक भी सभी प्रकाण्ड विद्वान कालिदास जी को सर्वश्रेष्ठ अद्वितीय कवि मानकर काफी आदर देते हैं।
जान कर खुशी होगी कि इनका ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ पहला भारतीय नाटक था, जिसे पश्चिमी भाषा में सर विलियम जोन्स ने अनुवादित किया था। इसी प्रकार ‘मेघदूत’ का होरेस हेमैन विल्सन ने अंग्रेजी में अनुवाद किया था।
इन्हीं सब कारणों से इनकी गणना भारत के ही नहीं, बल्कि संसार के अति सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में है क्योंकि नाट्य, महाकाव्य, खण्डकाव्य और गीतिकाव्य के क्षेत्र में इनकी अदभुत रचनाशक्ति अपने-आपमें बेजोड़ मानी जाती है।
महाविदुषी विद्योत्तमा व कविकुल चूड़ामणि कालिदास जी का जीवन दर्शन यह प्रेरणा देता है कि, शिक्षा से न केवल विद्वता प्राप्त होती है, बल्कि दरिद्रता दूर होकर जिन्दगी में खुशहाली भी आती है, साथ ही यश में भी वृद्धि होती है।
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