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‘सकारात्मकता’ ही मानसिक अवसाद का इलाज

शशि दीपक कपूर
मुंबई (महाराष्ट्र)
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आधुनिक समय में प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने संघर्षों से जूझ रहा है। एक से एक बढ़कर आकर्षित रहन-सहन, ऊँचे-ऊँचे पद पर स्वयं को आसीन करने की तीव्र इच्छा, उच्च शिक्षा के लिए अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने की लालसा, परिवारिक रिश्तों में आपसी छोटी-छोटी बातों को लेकर तनाव, अनुवांशिक बीमारी, दीर्घकालीन गंभीर बीमारी के कारण अस्वस्थता व औषधियों का दुष्प्रभाव और आधुनिक सुख-सुविधा प्रदान व मनोरंजन करने वाले संसाधनों पर आवश्यकता से अधिक निर्भरता, आमदनी की कमी, व्यसन की आदत वगैरह वगैरह अन्य ओर भी कारण मानसिक अवसाद के कारण हो सकते हैं।
मानसिक अवसाद को ‘डिप्रेशन’ के नाम से जाना जाता है। अनुवांशिक अपवाद के अतिरिक्त इस बीमारी से पीड़ित २० से लेकर ४० वर्ष के उम्र के व्यक्ति अधिकत्तर होते हैं, क्योंकि इसी आयु में व्यक्ति अपने जीवन की ऊँचाइयों को छूने की जद्दोजहद कर रहा होता है, सपने बुनता है, अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने की चेष्टा करता है, और पारिवारिक व सामाजिक मूल्यों के प्रति अपने दायित्व का पालन करने का प्रयास आदि सभी कुछ शामिल होता है। मानसिक अवसाद की स्थिति का आरंभ तभी होता है, जब व्यक्ति अपने सपनों, लक्ष्यों को प्राप्त करने में बार-बार असफल
हो जाता है, साथ ही अपने साथियों व रिश्तेदारों की बुलंदियों को देख कुंठित होने लगता है। धीरे-धीरे यही तनाव मानसिक स्तर पर अवसाद की ओर बढ़ने लगता है। आरंभ में व्यक्ति का ध्यान इस अवसाद की ओर नहीं जाता। वह अपनी परिस्थितियों से अपनी सहज क्षमता से अधिक पाने की अभिलाषा में निरंतर लगा रहता है। उचित स्तर या लक्ष्य प्रप्ति न होन पर बुद्धि भ्रमित ( द्वेष, कुंठा, ईर्ष्या ) आदि का विस्तार, शरीर में अम्लता वृद्धि, नींद न आना, खान-पान में अनियमितता, एक ही बात के बारे में आवश्यकता से अधिक सोचना हो सकते हैं। और इसी हालत में धीरे-धीरे सुनने व बात समझने में असमर्थ होने लगता है, अपनी पसंद की वस्तुओं, प्रिय मित्र व रिश्तेदारों तक से विमुख हो उदास व अकेलेपन का शिकार हो जाता है। यह मानसिक अवसाद व्यक्ति के सूँघने व स्पर्श शक्ति को भी क्षीण कर देता है।
मनोविकृति के इस मानसिक अवसाद से आरंभिक अवस्था पर इलाज करने पर व्यक्ति स्वस्थ हो सकता है। चिकित्सक के परामर्श, दवा व योग-अध्यात्म, खान-पान से लेकर नियमित दिनचर्या द्वारा व्यक्ति स्वस्थ होने का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
अति तो प्रत्येक चीज़ की बुरी ही होती है। अपने स्वास्थ्य व अपने आंतरिक मनोभावों को स्वयं से बढ़कर कौन जान सकता है ? स्वस्थ होने के लिए रोगी व्यक्ति में अपने भीतर दृढ़ता से जीने की इच्छा होना अति आवश्यक है, साथ ही जीवन के प्रति सद्-विचार, दूसरों से अपना तुलनात्मक अध्ययन करने से दूर रहना, रुचिकर चीज़ों में स्वयं को व्यस्त रखना, संगीत सुनना, सुबह-शाम सैर-योग-साधना करना, मित्रों-परिजनों से संवाद करना, महान विचारकों के जीवन से प्रेरणा लेना, पुस्तकें पढ़ना, आदि छोटी-छोटी जीवन की मूलभूत तथ्यों से सकारात्मक दृष्टि से जुड़े रहना ही मानसिक अवसाद से दूर रहना है।
मानसिक अवसाद से घिरे व्यक्ति के साथ सहज व्यवहार करना परिवार के सदस्यों की भी उतनी जिम्मेदारी है, जितनी अवसाद से ग्रस्त व्यक्ति में जीवन के प्रति सकारात्मक ऊर्जा का होना।
मानसिक तनाव के सवाल को गंभीरता से समझने का प्रयास, अपने-आपमें एक नए अनुभव से परिचित होने के समान है। अत:, मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।