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साजन! तुम न आए

राजबाला शर्मा ‘दीप’
अजमेर(राजस्थान)
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मन-मधुबन की सूनी कुटिया
बाट जोहती,आस जगाए,
पल-पल साल, महीने बीते
बरखा बैरन अगन लगाए,
लेकिन-
साजन! तुम न आए।

चौराहों पर दीप जलाए
पत्थर-पत्थर मन्नत मांगी,
हर शिवालय फूल चढ़ाए
मंदिरों में शीश झुकाए,
लेकिन-
साजन! तुम न आए।

अमर-बेल सी लिपटी रहती
मैं तेरी यादों से प्रियतम,
शुष्क हुए आँखों के आँसू
वेणी के गजरे मुरझाए,
लेकिन-
साजन! तुम न आए।

उर पलाश-सा दहक रहा है
नेहा के बोलों से सरसाओ,
हर आहट पर लगता मुझको
तुम आए हो, हाँ तुम आए
लेकिन-
साजन! तुम न आए।

काश! दुआएं सफल हों मेरी
टूटे न साँसों की डोरी,
हर पल युग-सा बीत रहा है
आस की बगिया सूखी जाए।
लेकिन-
साजन! तुम न आए॥

परिचय– राजबाला शर्मा का साहित्यिक उपनाम-दीप है। १४ सितम्बर १९५२ को भरतपुर (राज.)में जन्मीं राजबाला शर्मा का वर्तमान बसेरा अजमेर (राजस्थान)में है। स्थाई रुप से अजमेर निवासी दीप को भाषा ज्ञान-हिंदी एवं बृज का है। कार्यक्षेत्र-गृहिणी का है। इनकी लेखन विधा-कविता,कहानी, गज़ल है। माँ और इंतजार-साझा पुस्तक आपके खाते में है। लेखनी का उद्देश्य-जन जागरण तथा आत्मसंतुष्टि है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-शरदचंद्र, प्रेमचंद्र और नागार्जुन हैं। आपके लिए प्रेरणा पुंज-विवेकानंद जी हैं। सबके लिए संदेश-‘सत्यमेव जयते’ का है।