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सीख टोपी की

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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बेटा, सुन लो आज पिता का
अनमोल अनुभव, पक्का तजुर्बा,
इस दुनिया में सीधे चलना
अकसर बन जाता है सबसे बड़ा गुनाह।

सीधे-सादे लोग यहाँ
भीड़ में सबसे पहले कटते हैं,
जो टोपी पहनाना जान ले
वही आगे सबसे तेज़ बढ़ते हैं।

मुस्कान ओढ़ो, वचन मधुर रखो,
मन में कुछ और, मुख पर कुछ और,
सच की गठरी घर में छोड़ो,
बाज़ार में बिकता है बस चालाकी का शोर।

हर वादा लिखो पानी पर,
हर रिश्ता तौलो लाभ-हानि में,
जो भोला बनकर बैठा है
उसे बिठाओ अपनी कहानी में।

जब कोई पूछे- “सच क्या है ?”
तो सच को थोड़ा मोड़ देना,
टोपी उसकी आँखों पर रखकर
खुद को आगे जोड़ देना।

नेता बनो, व्यापारी बनो
या बन जाओ ज्ञानी कोई,
जो टोपी पहनाना सीख गया
वही कहलाया सबसे होशियार कोई।

पर सुन बेटा, एक बात कहूँ
जो अनुभव की अंतिम सीख है
हर टोपी जो तुम पहनाओगे
कभी न कभी खुद के सिर पर भी ठीक है।

क्योंकि इस दुनिया के मेले में,
हिसाब बहुत पुराना है।
जो आज पहनाता है टोपी,
कल उसी का सिर निशाना है॥