कुल पृष्ठ दर्शन : 359

You are currently viewing सुनहरी धूप

सुनहरी धूप

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

******************************************

हौले-हौले गुनगुनी धूप,
शरदाकुल प्यारा लगती है।
करे ऊष्म जगत नित शिथिल गात्र,
आलस तनु ऊर्जा भरती है।

पूर्णिमा धवल महिना कार्तिक,
सर्दी से धरा ठिठुरती है।
सुनहरी धूप आनन्दित जग,
कुसुमाकर सुरभि महकती है।

गुनगुनी धूप राहत जीवन,
बिन गेह वसन पथ रहती है।
कम्पायमान ठिठुरती तन-मन,
करुणामयी धूप सहजती है।

अरुणिम प्रभात बाहर सब जन,
मुस्कान किरण नभ सजती है।
विटामिन डी दे गुनगुनी धूप,
शीतोष्ण सुधा बन आती है।

सुनहरी धूप महिना अगहन,
मुक्ता ओस बूंद हर्षाती है।
आलस्य बहुत आकूल शीत,
निंद्रा नशा हृदय को भाती है।

सुनहरी धूप नीलाभ गगन,
लखि कृषक हृदय हर्षाती है।
हरित भरित चहुँ भुवि धान्य फ़सल,
ख़ुशियाँ मुस्कान दिलाती है।

हरर्षी कलसी नव पीत वसन,
सुनहरी धूप मदमाती है।
नवप्रीत युगल मधुमीत मिलन,
अरुणाभ प्रणय रच पाती है।

पाला हाला आप्लावित जग,
रवि दूज किरण छाती जाती है।
मानो लगता सुनहरी धूप,
नव वधू रूप शर्माती है।

नवजोत भोर सुनहरी धूप,
मधुशाल नशा बन आती है।
शीतकाल नववर्ष उदित,
सुनहर मिठास मन भाती है।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

Leave a Reply