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सृजन बना ईश वंदन

संजय गुप्ता  ‘देवेश’ 
उदयपुर(राजस्थान)

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रचनाशिल्प:मात्रा भार-१५

सृजन का नशा निराला है,
शब्दों में इसे ढाला है।
समझ सको तो तुम समझ लो,
नहीं तो अक्षर काला है॥

प्रश्न करूं जब मैं वक्त से,
कलम लिख रही वह रक्त से
कभी अमृत की बूँदें यही,
कभी विष का यह प्याला है।
सृजन का नशा निराला है…

जो निकलता मेरे मन से,
विचारों से जो छन-छन के
कभी बहती गंगा-सी है,
कभी दहक रही ज्वाला है।
सृजन का नशा निराला है…

चाह-प्रशंसा नहीं रही है,
कहूं मैं जो लगे सही है।
सृजन बना है ईश वंदन,
जो लिखा अर्पण माला है।
सृजन का नशा निराला है॥

परिचय–संजय गुप्ता साहित्यिक दुनिया में उपनाम ‘देवेश’ से जाने जाते हैं। जन्म तारीख ३० जनवरी १९६३ और जन्म स्थान-उदयपुर(राजस्थान)है। वर्तमान में उदयपुर में ही स्थाई निवास है। अभियांत्रिकी में स्नातक श्री गुप्ता का कार्यक्षेत्र ताँबा संस्थान रहा (सेवानिवृत्त)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप समाज के कार्यों में हिस्सा लेने के साथ ही गैर शासकीय संगठन से भी जुड़े हैं। लेखन विधा-कविता,मुक्तक एवं कहानी है। देवेश की रचनाओं का प्रकाशन संस्थान की पत्रिका में हुआ है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-जिंदगी के ५५ सालों के अनुभवों को लेखन के माध्यम से हिंदी भाषा में बौद्धिक लोगों हेतु प्रस्तुत करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-तुलसीदास,कालिदास,प्रेमचंद और गुलजार हैं। समसामयिक विषयों पर कविता से विश्लेषण में आपकी विशेषज्ञता है। ऐसे ही भाषा ज्ञानहिंदी तथा आंगल का है। इनकी रुचि-पठन एवं लेखन में है।