पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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ज़िंदगी एक वसंत… (वसंत पंचमी विशेष)…
प्रिय वसंत, तुम कब से
बर्फीले हो गए हो ?
‘ग्लोबल वार्मिंग’ से घबराकर,
कुहासे को साथ में लेकर
ओस की चादर ओढ़ कर,
धुंध और बादलों के रथ पर
होकर सवार,
सूरज को डरा कर
उसकी उष्ण किरणों को धमकाकर,
बर्फीली हवा के झोंके से
क्या तुम अपना रास्ता
भटक गए हो…!
कहाँ खो गए हो ?
मुझे खोजना है तुम्हें,
अपनी साँसों को तुम्हारी
खुशबू से महकाना है,
कहाँ खो गए हो
प्रयागराज के माघ मेले
के भूले-भटके केंद्रों में,
तुम्हारा नाम एनाउंस करना होगा
प्रिय वसंत अब आ भी जाओ,
बस भी करो तड़पाना
बाँहें पसारे हम कर रहे
तुम्हारा इंतजार।
अब बंद भी करो,
ये बादलों की लुका-छिपी
खत्म भी करो ठंड का
अत्याचार,
सरसों भी ठिठुर रही
जनजीवन अब हो रहा है व्याकुल,
लो आ ही गया मौसम वसंत का।
चारों ओर हरियाली छाई,
रंग-बिरंगे फूल खिले
पीली-पीली सरसों ने खेतों में
ले ली है अंगड़ाई,
खिल उठी है धरती की
हर बगिया और क्यारी,
आई है वसंत पंचमी।
विद्या की देवी माँ,
सरस्वती की करो वंदना
दें वरदान, हम सबके मन में
ज्ञान की ज्योति जलाएँ,
जीवन में सबके भर दें
उल्लास, उमंग और नवजीवन,
गाएँ प्रेम-प्यार के गीत,
आओ सब मिल कर करें।
माँ सरस्वती का पूजन,
स्वागत करें प्रिय वसंत का॥