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हमको न आज़माना

अकबर खान ‘शाद उदयपुरी’ 
उदयपुर(राजस्थान)

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 (रचना शिल्प:ग़ैर-मुदर्रफ़ ग़ज़ल-बिना रदीफ़ की)

तुम लाख दूर जाओ मगर कुछ भी नहीं होना,
हम दोनों साथ रहने की ख़ातिर हुए हैं पैदा।

हसरत नहीं हैं मुझको कि महलों में हो ठिकाना,
ये आसमाँ चादर हैं मेरी ये ज़मीं बिछौना।

पैसे कमाने के लिये क्या-क्या पड़ा है खोना,
देखूँ मैं पीछे मुड़ के तो आता है मुझको रोना।

समझा है तूने मुझको कि जैसे हूँ मैं खिलौना,
लगता है मुझपे करते हो तुम कोई जादू-टोना।

हमसे वफ़ा की खुशबूएँ दुनिया में फ़ैलती हैं,
ये सुन लो कान खोल के हमको न आज़माना।

तितली की तरह उड़कर तुम आओगी मेरी जानिब,
कर दूंगा तुमको एक दिन अपना मैं जब दीवाना।

शिकवे तमाम तेरे कर देंगे दूर लेकिन,
नफ़रत के बीज़ दिल में मुझको नहीं है बोना।

गर छोड़कर गया मैं कभी दुनिया को बिन बताये,
आँखों को अपनी अश्कों से हरगिज़ न तुम भिगोना।

ऐ ‘शाद’ तेरे लब्ज़ों ने वो काम कर दिया है,
ज़ख़्मों से मेरे बच न सका दिल का कोई कोना॥

परिचय-अकबर खान  को शायर अकबर खान कहलाना पसंद है। इनका उपनाम ‘शाद उदयपुरी’ है। जन्म तिथि २ जुलाई १९८० एवं जन्म स्थान-बनारस है। वर्तमान पता उदयपुर स्थित  श्याम नगर(भुवाणा)है। राजस्थान का यही शहर उदयपुर आपका स्थाई निवास है। श्री खान ने कम्प्यूटर अभियंता सहित व्यापार प्रशासन में स्नातकोत्तर और व्यापार प्रबंधन में भी स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया है। आपका कार्यक्षेत्र-व्यवसाय है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंदी शायरी को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर हिंदी कविता का आयोजन करवाते हैं। लेखन विधा-शेर,रचना और ग़ज़ल है। ब्लॉग पर भी लिखने वाले श्री खान की रचनाओं का   प्रकाशन पत्र-पत्रिकाओं में हुआ है। अकबर खान की लेखनी का उदेश्य-हिंदी भाषा में ग़ज़ल-गीत को बढ़ावा देना है।