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हम जैसा

संजय एम. वासनिक
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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चराग़ बुझा दो सारे के सारे..
यादों की रौशनी ही काफ़ी है,
तेरा यूँ मुझमें समा जाना
मेरी रूह के लिए काफी है…।

फिर वही मंजर, वही अंधेरा,
आसमां में चाँद भी रोता है…
रातभर की तन्हाइयां,
और तारों की खामोशियाँ
बयां करती है जिदंगी की कहानियाँ…।

मेरी जिंदगी में अब भी बाकी है…,
दु:ख-दर्द के साथ साथ हौंसले
लड़ने के लिए मुस्कुराते हुए,
हम मुस्कुराकर छुपा लेते हैं
ग़म अपनी मुस्कुराहट के पीछे।

देख कर मुस्कुराते हुए हमें…
लोग भी करते हैं दुआ।
हम जैसा मुस्कुराने की,
हम जैसा मुस्कुराने की…॥