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हास्य-कलाकार सचमुच खतरे में ?

अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

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दुनिया के प्रतिष्ठित ऑस्कर पुरस्कार समारोह में जाने-माने अभिनेता विल स्मिथ ने अपनी पत्नी के गंजेपन को लेकर की गई टिप्पणी पर हास्य कलाकार क्रिस रॉक को थप्पड़ मारने के बाद अब माफी जरूर मांग ली है,लेकिन सामाजिक संचार पर यह मुद्दा जिंदा है और इस ‘अभूतपूर्व’ वाकिए’ पर फिल्म जगत २ भाग में बंट गया है। कुछ का मानना है कि स्मिथ की जगह और कोई भी होता तो वही करता। कुछ अन्य का मानना है कि क्रिस ने गंजेपन पर महज मजाक किया था और उसे उसी रूप में लिया जाना चाहिए था,क्योंकि हास्य का मकसद तंज के साथ मनोरंजन करना ही है। उसमें दुर्भावना को तलाशना सही नहीं है। इस बीच बॉलीवुड के जाने-माने अभिनेता,पूर्व भाजपा सांसद और अच्छे कलाकार परेश रावल ने प्रकरण पर टिप्पणी की कि आज पूरे विश्व में हास्य कलाकार खतरे में हैं। फिर चाहे क्रिस रॉक हों या यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की। थप्पड़ खाने वाले क्रिस तो मशहूर हास्य कलाकार हैं। पूरे प्रकरण का निहितार्थ यही है कि अब दुनिया में मजाक करना भी खतरे से खाली नहीं रहा। लोगों की भावनाएं इतनी नाजुक और काँच की माफिक हो गई हैं कि कब,कहां और किस वजह से भावना आहत हो जाए,कहा नहीं जा सकता। राजनीतिक,धार्मिक और नस्ली दुराग्रहों ने हँसी की उदात्त दुनिया को और तंग कर दिया है। अब तो खुद पर हँसना भी दूभर है। हालात ये हैं कि आप अगर हँसना-हँसाना भी चाहते हैं तो कि कार्यक्रम के मंच पर ही चलना होगा,वरना फांसी का फंदा तैयार है।
विल स्मिथ ने ‘किंग रिचर्ड’ में रिचर्ड विलियम्स की भूमिका के लिए अपना पहला सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर पुरस्कार जीता। पुरस्कार लेने जैसे ही स्मिथ मंच पर पहुंचे तो क्रिस रॉक ने उनकी पत्नी के गंजेपन को लेकर चुटकुला सुनाया,जिस पर स्मिथ भड़क गए और उन्होंने थप्पड़ जड़ दिया।
बहुतों के मन में यह सवाल कौंध रहा है कि गंजेपन पर तंज करने की क्या जरूरत थी ? वो इससे बच भी सकते थे,क्योंकि गंजापन किसी दुसाध्य रोग के कारण है,शौकिया नहीं। लिहाजा यह कोई मजाक का विषय नहीं है। फिर भी क्रिस ने ये दुस्साहस क्यों किया ? किसी के जज्बात को आहत करना तो मजाक नहीं हो सकता। हालांकि,मजाक पर पहले तो स्मिथ ने महीन मुस्कान देकर अनदेखा करने की कोशिश की,लेकिन दूसरे ही क्षण उन्हें लगा कि यह पत्नी का अपमान है तो पति धर्म जागा और उन्होंने तड़ से क्रिस का गाल लाल कर दिया। इस हिंसक प्रतिक्रिया से भौंचक क्रिस ने कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की। अलबत्ता,यह अप्रत्याशित दृश्य देख दुनिया हैरान रह गई और विश्व भर में हास्य कलाकारों के दुर्दिनों पर बहस शुरू हो गई। गनीमत यह रही कि इस थप्पड़ कांड में शामिल दोनों व्यक्ति अमेरिकी अश्वेत हैं,वरना यह घटना नस्ली संघर्ष का नया शोला भी बन सकती थी। विल स्मिथ ने अपने किए पर अफसोस करते हुए बाकायदा माफीनामे के रूप में चिट्ठी जारी की। उसमें उन्होंने लिखा कि ‘हिंसा किसी भी रूप में सही नहीं है। मैं इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगता हूँ।` आशय ही था कि,उन्हें मंच पर ऐसा नहीं करना चाहिए था,बल्कि संयम बरतना था।
उधर,इस घटना पर अमेरिकी विदूषक (कामेडियन) और अभिनेत्री कैथी ग्रिफिन ने विल स्मिथ पर निशाना साधते हुए लिखा-अब हमें इस बात की चिंता करना चाहिए कि कॉमेडी क्लबों और थिएटर्स में अगला विल स्मिथ कौन बनना चाहेगा ? यहां असल मुद्दा हास्य और हास्य कलाकारों के वजूद पर मंडराते खतरे का है। हँसना और हँसाना मनुष्य को ईश्वर से मिली अनुपम देन है। वरना अन्य प्राणियों में तो केवल डाॅल्फिन ही हँसना जानती है और वो भी समुद्र में रहते हुए। ऐसा लगता है कि हमारे जीवन से उन्मुक्त हँसी का स्थान खत्म होता जा रहा है। हँसने का अर्थ अब मजाक के बजाए मजाक उड़ाना या फिर प्रतिशोध भर होने लगा है, जबकि हँसना-गुदगुदाना समाज को स्वस्थ रखने की एक सांस्कृतिक औषधि रहती आई है। भारतीय परंपरा में भी लोक नाट्यों और प्रहसनों में एक विदूषक जरूर हुआ करता था,जो राजा से लेकर प्रजा और देवताओं से लेकर प्रकृति तक हर मुद्दे पर तंज किया करता था। लोग पेट पकड़कर हँसते थे। विदूषक के साहस की दाद देते और फिर सब भूल जाते थे। मजाक को मजाक की तरह ही लिया जाता था।
अब मजाक पहले खांचों में रख कर देखा जाता है। उसके हिसाब,उसकी स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता और प्रतिक्रिया तय होती है। क्रिस ने तो विल की पत्नी के गंजेपन पर ही तंज किया था,लेकिन विदूषक कई बार राजनीतिक,धार्मिक और सामाजिक व्यंग्य भी करते हैं। आज सबसे मुश्किल राजनीतिक-धार्मिक हास्य करने वालो की है। उनका धंधा बंद होने की कगार पर है। वैसे भी इस तरह की हँसी की गुंजाइश सिर्फ लोकतांत्रिक देशों होती है। धार्मिक कट्टरपंथी,तानाशाह और कठोर वामपंथी देशों में इसकी कोई जगह नहीं है,लेकिन अब लोकतांत्रिक देशों में भी मजाक को प्रतिशोध के चश्मे से ज्यादा देखा जाने लगा है। उदारता प्रति-उदारता के तराजू में तौली जाने लगी है। एक तरह से हँसना-हँसाना भी रिमोट कंट्रोल से संचालित होने लगा है। हमारे ही देश में हास्य में वामपंथी रूझान तलाशा गया तो कई प्रदर्शन इसीलिए रद्द हो गए,क्योंकि प्रधानमंत्री की पंजाब में रद्द हुई रैली पर तंज किया था। बंगाल जैसे कुछ राज्यों में कार्टूनिस्ट भी सत्ताधीशों के निशाने पर रहे हैं।
यूँ कलाकार राजनीति में भी अपने झंडे गाड़े, ऐसा कम ही होता है,क्योंकि कला और राजनीति की संवेदनाएं अलग अलग होती हैं। उनके तकाजे और चुनौतियां भी जुदा जुदा होती हैं। राजनीतिज्ञ भले ‘कलाकार’ हों,लेकिन कलाकारों को राजनेता के रूप में कम ही स्वीकारा जाता है। इस लिहाज से यूक्रेनी जनता का हास्य कलाकार जेलेंस्की को राष्ट्रपति चुनना असाधारण बात है।
जेलेंस्की आक्रामक पुतिन से जिस तरह लोहा ले रहे हैं,वो भी हैरान करने वाला है। यह शायद एक विदूषक की ‍जिजीविषा है। जेलेंस्की नाटो की शह पर यह सब कर रहे हैं या यूक्रेन की संप्रभुता के लिए लड़ रहे हैं,यह बहस का विषय है,लेकिन यह सवाल मार्के का है कि क्या एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में यूक्रेन को अपनी नीति तय करने का अधिकार भी नहीं है ? यकीनन जेलेंस्की अभी जो कर रहे हैं,वो यकीनन हास्य तो नहीं ही है।
इसमें संदेह नहीं कि दुर्भावना हास्य की आत्मा नहीं हो सकती। वह जज्बात को छूती हुई निकल जाती है,पर घाव नहीं करती। वो गुदगुदाती है,गला नहीं पकड़ती। सच्ची हँसी-हास्य इंसान को संकीर्णताओं से स्वच्छ करती है,लेकिन सब ऐसा नहीं सोचते। उनका मानना है कि थप्पड़ खाने के बाद क्रिस आइंदा किसी की भी बीवी पर तंज कसने पर २ बार सोचेंगे। भीड़ का न्याय यही कहता है। बावजूद इसके कि हास्य कोई चरित्र हत्या नहीं है। विल स्मिथ ने भी क्रिस को तुरंत सबक तो सिखाया,पर लेकिन बाद में अहसास हुआ कि हास्य का जवाब प्रति हास्य तो हो सकता है,थप्पड़ नहीं। थप्पड़ प्रकरण में अभिनेता स्मिथ का अफसोस जताना उन्हें पति स्मिथ से आगे की पायदान पर रखता है। उन्होंने ऐसा किसी के दबाव में किया या फिर अंतरात्मा के कहने पर किया,कहना मुश्किल है,पर ऐसा करके उन्होंने मानवता के उस गुण को जरूर बचा लिया है,जो मनुष्य को दूसरे प्र‍ाणियों से अलग करता है। विवेकशीलता को प्रतिष्ठित करता है।

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