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है प्रजातंत्र भारत स्वतंत्र

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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है प्रजातंत्र भारत स्वतंत्र,
सार्वभौम हिन्द कहलाते हैं
गणतंत्र मुदित संघीय चरित,
बन एक राष्ट्र मुस्काते हैं।

हर शहीद सपनों का भारत,
अरुणाभ प्रगति चमकाएँगे
मुस्कान शान्ति खुशियाँ वैभव,
नव शौर्य राष्ट्र यश गाऍंगे।

पा आज़ादी आज़ाद वतन,
हम राष्ट्रगान जय गाते हैं
गणतंत्र विनत बलिदान शौर्य,
संविधान मंत्र हम गाते हैं।

लक्ष्य राष्ट्र सर्वोपरि जीवन,
ध्वजा तिरंगा लहराते हैं
सौगंध वतन बलिदान गात्र,
हम विजय गीत रच पाते हैं।

माँ भारत के वीर सपूतों,
हम अपना शीश झुकाते हैं
कसम तुम्हारी कुर्बानी की,
हम तन-मन सर्वस्व लुटाते हैं।

ले कसम भारती माँ सपूतों,
जयगान वतन हम गाते हैं
आन-शान सम्मान तिरंगा,
उन्मुक्त गगन लहराते हैं।

अरुणाभ प्रगति समरसता मन,
सद्भाव शान्ति रख पाते हैं
हम कसम राष्ट्र कर्त्तव्य पथी,
पौरुष ख़ुद भाग्य बनाते हैं।

खा कसम धरा निज मातृभूमि,
अनुसंधान सुपथ नित बढ़ते हैं
नव कीर्ति धवल अनमोल प्रगति,
रच भारत लाज बचाते हैं।

खा कसम मातु का दूध कर्ज,
नारी सम्मान बचाते हैं
परमार्थ ध्येय रख जन सेवन,
चहुँ विकास राष्ट्र कर पाते हैं।

वृक्षारोपण अर्पित जीवन,
हरित प्रकृति कसम हम लेते हैं
प्राण वायु स्वच्छ वातावरण,
आरोग्य राष्ट्र रख पाते हैं।

सब सुखी खुशी शिक्षित हो जन,
साक्षरता कसम निभाते हैं
जाति धर्म भाष निर्भेद वतन,
संविधान गीत सम गाते हैं।

कसमें आज़ादी परवाने,
संघर्ष शौर्य नित गाते हैं
अरमान समुन्नत भारत मन,
सीमान्त सबल बन पाते हैं।

पलभर मानव जीवन अतुल्य,
नीति-प्रीति सुपथ सजाते हैं
रख मान लाज मानवता का,
संस्कार चरित अपनाते हैं।

सदाचार पथिक रचना जीवन,
मुस्कान सदय रख पाते हैं
बन क्षमावान औदार्य विनत,
कसमें संस्कृति निभाते हैं।

बन एक राष्ट्र छत एक संघ,
हम कसम राष्ट्र की खाते हैं।
फिर विश्वगुरु बन शौर्य विजय,
अरुणाभ ज्योति बरसाते हैं॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥