सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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क्यों मधुबन में भँवरे गुंजित,
क्यों प्राण मेरे होते विचलित
क्या क्षितिज तलक मैं देखूँ जा,
क्यों नयन मेरे होते पुलकित ?
गिरि उर से क्यों बहते निर्झर,
क्यों झरते हरश्रृंगार झर-झर
क्या रवि-शशि से मैं पूछूँ जा,
मन करता क्यों नर्तन सुंदर ?
क्यों आम्र-कुंज में पिक मुखरित,
क्यों इन्द्रधनुष में रंग चित्रित
क्या अश्रु-हास से बोलूँ जा,
कोई आने को है चिर-परिचित।
चेतना बुद्धि बन नवल सृजन,
प्रकृति लुभाती है मोहन।
तुम हो जो बसते हो हर पल,
मेरे मानस में बन धड़कन॥
