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अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल

आचार्य संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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उत्तर प्रदेश का जिला शाहजहाँपुर,
राम प्रसाद का जन्म खुशियाँ भरपूर
तिथि ११ जून १८९७ याद रखें जरूर,
महान् राष्ट्रभक्त शहीद पर करें गुरुर।

प्रेरित की माँ मूलवती, पिता थे मुरलीधर,
हाईस्कूल के बाद दिल में आज़ादी का गदर
शिक्षा अधूरी छोड़, हो चले क्रांतिकारी सफ़र,
१९ वर्ष के युवा पर ५ बार गिरफ़्तारी का कहर।

शब्द-शब्द के बाण चलाते, समाचार-पत्र प्रभाव,
काव्य, साहित्य के भाव में देशभक्ति के भाव
आज़ादी के दीवानों को जोड़े इनका अपनाव,
क्रांतिदूत राम प्रसाद बिस्मिल चिंतन ब्रिटिश से दुर्भाव।

क्रांतिकारी कवि-लेखक ने किया ‘काकोरी काण्ड’,
ब्रिटिश खजाना लूटना मकसद, घुमा दिया ब्रह्मांड
बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी, अशोगुल्ला खाँ, चंद्रशेखर आजाद,
आज़ादी के हमसफ़र शहीदों ने हम सबको किया आबाद।

गिरफ्तारी के बाद बनता वकील न कोई पैरवीकार,
न्यायालय में खुद शहीद थे अपनी पैरवी के जिम्मेदार
वैसे अनेक थे देश में आज़ादी की लड़ाई में नम्बरदार,
लेकिन शहीदों की खातिर वो सब हो जाते खबरदार।

जेल यातना, गोरखपुर जेल में फाँसी पर लटकाए,
आज़ादी की खुले जंग में अंग्रेजों ने शव भटकाए
अंग्रेजों की तानाशाही तनिक न उनको भाए,
सरफ़रोशी की तमन्ना, देश-प्रदेश के शहीद जगाए।

राम प्रसाद बिस्मिल की कविता अब भी हमें जगाए,
“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजु-ए- कातिल में है
हम हैं इसके मालिक, मिट्टी का कण-कण,
हम हैं इसके रक्षक, जीवन का हर क्षण”
ऐसे अनेक शब्द गोलों, बारुदों से फिरंगियों को दहलाए।

दहशत में परिवार व रिश्ते शव कैसे ले जाएं ?
शव संस्कार स्थल तक प्रतिबंधित हो जाएं
राप्ती नदी के तट पर बरहज (देवरिया) में उन्हें जलाएं,
अस्थि कलश तक संगम में न प्रवाह कर पाएं।

कितनी पीड़ा झेली शहीद ने, कैसे-कौन बताए ?
रक्त की गरमी से लिखा है इतिहास, जो हमें जगाए
ताम्रपात्र में रखी अस्थियाँ हमें सौ आँसू रुलाए,
बरहज परमहंस आश्रम में समाधि पर शीश झुकाएं।

बाबा राघव दास के हाथों से बिस्मिल मोक्ष थे पाए
राप्ती नदी के राजघाट तक बिस्मिल को पहुँचाए
आश्रम के बाबा राघव दास समाधि पर दीप जलाएं,
चलें परम हंस आश्रम बिस्मिल समाधि, फिर से अलख जगाएं।

आओ चलो राम प्रसाद बिस्मिल से मिलने चलकर जाएं,
त्याग, तपस्या, बलिदान, आज़ादी का वही जुनून बनाएं।
एक फूल की माला ले समाधि तक मेरे बच्चे भी जाएं,
शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की याद में नारा जिंदाबाद लगाएं॥

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे आचार्य संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएस-सी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता व रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुम्बई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़े हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। सम्मान-पुरस्कार में आपको महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२०२३ सहित अन्य मिले हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार करना है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज-पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”