डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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जिन्दगी एक वसंत (स्पर्धा विशेष)…
हे सखी, पतझड़ बीता वसंत आया,
पर पूर्ववत् उल्लास ना लाया
शहर में आया सिसक-सिसक के,
क्यों गाँव में चली हवा मचल के।
कटते जा रहे, सब वन-उपवन,
जलती धरा और बढ़ती तपन
प्लास्टिक से फैल रहा प्रदूषण,
बिगड़ रहा है प्रकृति सन्तुलन।
अगर सचेत ना मानव होगा,
तो आगे ना जाने क्या होगा… ?
क्या कोयल गाएगी महलों में,
कली, फूल खिलेंगे गमलों में
भ्रमर गुंजार करना भूलेंगे!
ना खग वृंद कलरव गान करेंगे
कवि का कल्पित वसंत न होगा,
तो आगे ना जाने क्या होगा…?
कल-कल सरिता किधर बहेगी,
पीली सरसों कहाँ खिलेगी ही
ना मंजर की खुशबू ही फैलेगी,
महुए की मादकता ना होगी।
सोचो, फिर जीवन कैसा होगा,
तो आगे ना जाने क्या होगा…?
जीवन में मिले, खुशी अनन्त,
समझो जीवन है एक वसंत
जीवन के मझधार का दृश्य,
अक्सर आँखों में आ जाता है।
इस वसंत को नहीं जिया तो,
तो आगे ना जाने क्या होगा ?
घोर तिमिर दृष्टिगोचर होता,
जीवन वसंतरहित दिखता है।
असमर्थ हुआ जाता है मानव,
नियति पर वश न चलता है।
प्रकृति श्रृंगार अगर न होगा,
तो आगे ना जाने क्या होगा ??