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इतनी प्रीत क्यों अंगूर की बेटी से

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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तुम प्रीत इतनी क्यों करते हो,
अंगूर की बेटी से
वह तो है एक मीठी छुरी,
अपनी गिरफ्त में कस लेती।

जो हर एक भोले-भाले को,
पहले तो हँस-हँस के
पिलाती जाम अपने नाम से,
फिर बड़ी उमंगें, बड़ी तरंगें।

उड़ती है सिर्फ नाम से,
आकर्षण से ही
खिंचे-बंधे आ जाते,
कितने पास तेरे।

हँसी-हँसी में पी कर,
बन जाते हैं बदनाम
बदनाम होने का गम,
फिर डुबो देती।

अंगूर की बेटी में,
यह ऐसी है हरजाई
तुमको सिखला देगी बेवफाई,
बदनाम कर देगी।

प्रीत निभाते हो क्यों ?
अंगूर की बेटी से।
बीबी रूठ के मैके चली जाएगी,
लौट के न आएगी।

रह जाओगे तुम अकेले,
तब और भी गम सालेंगे
डूबोगे तब तुम और,
फिर अंगूर की बेटी में।

तेरे बच्चे हो जाएं बदनाम,
शराबी के बच्चे कहलाएं
कैसे तुम संभालोगे तब उनको,
संस्कार कहाँ से लाओगे ?

तुम तो खुद बे-घरबार,
हो जाओगे क्योंकि
सब पैसे अंगूर की बेटी को,
सप्रेम भेंट चढ़ाओगे।

मेरा कहा मानो,
तुम छोड़ दो।
प्रीत लगाना,
अंगूर की बेटी से॥