कुल पृष्ठ दर्शन : 1

एक अधूरा आदमी

डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
*****************************************

आज सुबह से ही उसे लक्ष्मी याद आ गई। उस समय एक चोका था, सबसे पहले वह खाने का भोग ठाकुर जी को लगाती थी… उसकी घंटी की आवाज सुन कर सभी अनुमान लगा लेते थे, कि ठाकुर जी को भोग लग गया, अब खाना मिलेगा !
जब वह पूजा करने बैठे, तो सामने लकड़ी का सिंहासन था। उन्हें लगा कि सिंहासन भी कितना उदास है ? लक्ष्मी ने सामने खड़े होकर सुतार से उसे बनवाया था। ठाकुर जी की पोशाक कितनी गंदी लग रही ? जब से वह चली गई, तब से पोशाक ही नहीं बदली गई ! कितने चाव से वह उन पोशाकों को सिला करती थी !

जैसे-तैसे उन्होंने पूजा की और किचन में जाकर वह अपनी थाली लगाने लगे। बाई खाना बना कर रख गई थी। सुबह से ही अन्यमनस्कता के कारण आज खाने में विलम्ब हो गया तो वह खाने के बाद वाली दवाई नहीं ले पाए थे। प्लेटफार्म को खाली देखकर उन्हें याद आया, कि वह ठाकुर जी को भोग लगाने के बाद… एक गाय और एक कुत्ते की रोटी यहाँ निकाल कर रख दिया करती थी। उन्होंने भी २ रोटी निकाल कर वहाँ रख दी। थाली में रोटी रखते हुए सोचने लगे, कि वह टेबल को सजा कर चम्मच से टेबल बजाया करती थी… ठक… ठक…. ठक… ठक की आवाज सुनकर बच्चे वहाँ दौड़कर आ जाया करते थे। और अब… १ चोका, ३ चोकों में बंट गया ! कटोरी में सब्जी परसते-परसते आँख से आँसू टपका और उसमें गिर गया।…. तुम्हारे कारण यह परिवार एक गुलदस्ता था… अब सारी पंखुड़ियाँ झड़ गईं सिर्फ मैं… ठूंठ-सा बच गया! पहले तुम थीं… तो ‘हम’ थे ! अब ‘मैं’ हूँ बस… ! तुम्हारे कारण प्रेम का जो अलिखित अनुबंध परिवार में था, लगता है वह तुम्हारे जाते ही टूट गया!