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एक रंग ऐसा भी…।

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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वसंत की पुरवाई में सतरंगी छटा में देशभक्ति के मधुर तराने व गीत-संगीत का दृश्य टेलीविजन पर चल रहा था। “मेरा रंग दे बसंती चोला”…, जिसे घर में बैठी बूढ़ी माँ सुन रही थी, क्योंकि उसका बेटा फौज में गया था। देशभक्ति के गाने जब भी सुनती थी, तो उस माँ की नस-नस में देशप्रेम हिलोरे ले रहा होता था।

अचानक उस घर में एकदम शांति हो गई। शांत वातावरण में जैसे ही उस माँ ने देखा तो दरवाजे पर ४-५ सैन्य जवानों के साथ उसके गौरव का धुंधला दृश्य तिरंगे में लिपटा हुआ था। वसंत के उस हवा के झोंके में उस माँ ने अपने कलेजे पर पत्थर रखकर एक रंग ऐसा भी देखा। उस बेटे ने सीमा पर लड़ते हुए अपनी भारत माता के चरणों में रक्षा करते-करते अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया था। माँ ने आँसू को रोकते हुए अपने लला को ‘सैल्यूट’ किया और हाथ उठाकर ‘भारत माता की जय’ बोलती हुई अपने दुःख को अंगीकार कर लिया।