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ऐसी शिक्षा नीति की आवश्यकता, जो प्रतिभा को जाति से ऊपर रखे

ललित गर्ग

दिल्ली
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नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा विवि अनुदान आयोग के माध्यम से उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता के नाम पर लागू किए गए नए नियमों ने देश के शैक्षिक और सामाजिक परिदृश्य में एक बार फिर गहरी हलचल पैदा कर दी है। जिस नीति को ‘समता’, ‘समान अवसर’ और ‘समावेशी शिक्षा’ की भावना से जोड़कर प्रस्तुत किया गया, वह व्यवहार में आते ही एक वर्ग विशेष के तीव्र विरोध, व्यापक असंतोष और सामाजिक तनाव का कारण बन गई। स्थिति इतनी विकट हुई कि सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप कर इन नियमों पर अंतरिम रोक लगानी पड़ी। यह रोक न केवल सरकार की नीति-निर्माण प्रक्रिया पर एक प्रश्नचिह्न है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अतिशयोक्तिपूर्ण और असंतुलित प्रयोग देश को किस दिशा में ले जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय का यह हस्तक्षेप किसी नीति के समर्थन या विरोध का सीधा निर्णय नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक चेतावनी है कि समानता के नाम पर लागू नियम यदि अस्पष्ट हों, दुरुपयोग की संभावना रखते हों और सामाजिक सौहार्द को बाधित करते हों, तो वे न्यायिक समीक्षा से परे नहीं रह सकते। अदालत ने प्रथम दृष्टया यह माना कि यूजीसी के नए नियमों में स्पष्टता का अभाव है और यही अस्पष्टता उन्हें विवादास्पद बनाती है। यह रोक सरकार को आत्ममंथन का अवसर देती है। एक ऐसा अवसर जिसे राजनीतिक टकराव के बजाय सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए। प्रश्न यह है कि जो सरकार बार-बार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ की बात करती रही है, वह शिक्षा संस्थानों जैसे विचार-निर्माण के केंद्रों में ऐसे नियम क्यों लाई, जिनसे जातिगत पहचान और वर्गीय विभाजन की रेखाएँ और गहरी होने की आशंका पैदा हो गई। भारत का सामाजिक इतिहास इस तथ्य का साक्षी है, कि जाति के नाम पर की गई किसी भी नीति ने, चाहे उसका उद्देश्य कितना ही कल्याणकारी क्यों न रहा हो, समाज को भीतर ही भीतर विभाजित किया है। आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था सामाजिक न्याय के लिए लाई गई थी, लेकिन इसके लम्बे प्रयोग ने देश को ऐसे घाव भी दिए हैं, जिनका उपचार आज तक पूर्ण रूप से नहीं हो सका। ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में जातिगत आधार को और उभारने वाली किसी भी पहल को लेकर स्वाभाविक रूप से आशंका उत्पन्न होती है।
शिक्षा संस्थान केवल उपाधि बांटने की फैक्ट्रियाँ नहीं होते; वे समाज की दिशा तय करने वाली प्रयोगशालाएं होते हैं। यहाँ तैयार होने वाला छात्र केवल नौकरीपेशा व्यक्ति नहीं, बल्कि भविष्य का नागरिक होता है। यदि यही परिसर अविश्वास, वर्ग-संघर्ष और परस्पर शंका के केंद्र बन जाएं, तो इसका प्रभाव केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर करता है। आयोग के नए नियमों को लेकर उठा विरोध इसी आशंका का प्रकटीकरण है। यह भी विचारणीय है कि समानता और समता के बीच का अंतर नीति-निर्माण में किस हद तक समझा गया। समानता का अर्थ है सबके साथ एक जैसा व्यवहार, जबकि समता का अर्थ है परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संतुलित अवसर देना। यदि समता के नाम पर ऐसे प्रावधान किए जाएं जो एक नए प्रकार की असमानता को जन्म दें, तो वह नीति अपने उद्देश्य से भटक जाती है। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी इसी बिंदु की ओर संकेत करती है कि नियमों का उद्देश्य भले ही सकारात्मक रहा हो, लेकिन उनकी संरचना और भाषा ने विवाद और भ्रम को जन्म दिया।
यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है, कि इस पूरे मामले में राजनीतिक रंग तेजी से हावी होता गया। पक्ष-विपक्ष दोनों ने इसे अपने-अपने हितों के चश्मे से देखना शुरू कर दिया, वोट बैंक की राजनीति से इसे देखा जाने लगा जबकि यह विषय मूलतः शिक्षा सुधार और सामाजिक संतुलन से जुड़ा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं कई अवसरों पर यह कहते रहे हैं कि शिक्षा को राजनीति से मुक्त रखा जाना चाहिए और नीतियाँ दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर बननी चाहिए। फिर यह सवाल उठना स्वाभाविक है, कि आयोग द्वारा बनाए गए इन नियमों में उस दूरदर्शिता और संतुलन का अभाव क्यों दिखा ? लगता है कि आयोग ने जल्दबाजी में बिना सोचे समझे इसे लागू कर दिया, यदि आयोग ने व्यापक संवाद, पक्षों से परामर्श और संभावित दुरुपयोग की आशंकाओं का पूर्व आकलन किया होता, तो शायद यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती। नीति बनाते समय केवल कानूनी वैधता पर्याप्त नहीं होती;सामाजिक स्वीकार्यता और नैतिक संतुलन भी उतने ही आवश्यक होते हैं। न्यायालय ने भी अपने आदेश के माध्यम से यही संकेत दिया है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी बदलाव से पहले उसके दूरगामी प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
नए नियमों की सबसे बड़ी कमजोरी एवं त्रासदी यही रही कि वे आरक्षित और सामान्य वर्गों को एक-दूसरे के सामने खड़ा करके विद्रोह एवं विरोध में खड़ा कर दिया। यह विभाजनकारी प्रवृत्ति न केवल शिक्षा के वातावरण को दूषित करती है, बल्कि उस राष्ट्रीय एकता की अवधारणा को भी कमजोर करती है, जिसकी बात हम संविधान में करते हैं। किसी भी नीति का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वह समाज को जोड़ती है या तोड़ती है। यदि वह अविश्वास और टकराव को बढ़ावा देती है, तो उस पर पुनर्विचार अनिवार्य हो जाता है। न्यायालय
द्वारा लगाई गई रोक को किसी की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक सुधार का अवसर है-सरकार, आयोग और समूचे शैक्षिक तंत्र के लिए। यह समय है कि भावनाओं और राजनीतिक आग्रहों से ऊपर उठकर एक ऐसी नीति बनाई जाए, जो वास्तव में समान अवसर सुनिश्चित करे, लेकिन बिना किसी नए विभाजन को जन्म दिए।
देश को ऐसी शिक्षा नीति की आवश्यकता है जो प्रतिभा को जाति से ऊपर रखे, अवसर को पहचान से मुक्त करे और परिसरों को संघर्ष का नहीं, संवाद का केंद्र बनाए। सर्वोच्च न्यायालय की यह रोक उसी दिशा में एक संकेत है। अब यह सरकार और आयोग की जिम्मेदारी है कि वे इस संकेत को समझें, आत्मावलोकन करें और ऐसे नियम गढ़ें जो वास्तव में भारत की समावेशी, संतुलित और भविष्यद्रष्टा संरचना के अनुरूप हों। यदि इस अवसर को भी राजनीतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ा दिया गया, तो यह केवल एक नीति की विफलता नहीं होगी, बल्कि उस विश्वास की भी हार होगी, जो जनता ने शिक्षा सुधारों से जोड़ रखा है।