हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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‘स्वागत, संकल्प, संघर्ष और सफलता’ (नववर्ष २०२६ विशेष)…
हर कोई ज़िन्दगी में सफ़र करता है, क्योंकि जीवन की कहानी भी यही है। चलना ही सच की निशानी है। समय-चक्र भी दिन, महीने, साल के बीत गए। नई उमंग, नए विचार नया-नया लगता है यहाँ संसार। “दादा भाई चलते हैं” कहीं बाहर घूमने-फिरने।” प्रवीण बोलता है। “दादा भाई बनाते हैं पहाड़ों पर घूमने-फिरने का प्रोग्राम, मौसम बहुत सुहाना बना है।”
“अरे प्रवीण जी, समय तो अपनी चाल चलता है। थोड़ा अपने लोगों के लिए समय निकालना हमारा अच्छा प्रयास होगा। आज-कल व्यस्तता इतनी रहती है। कहीं आने-जाने या घूमने का वक़्त नहीं मिलता, लेकिन कभी-कभी ऐसे वातावरण व मौसम के साथ यहाँ साल भी बीतता है। तो हम लोगों को लगता है, कहीं सुकून के पलों को अपने लोगों के साथ बिताएं, क्योंकि ‘जो बीत गया सो बीत गया’। अब ईंट, पत्थरों के इन जंगलों से बाहर निकल कर हरियाली व प्राकृतिक वातावरण के करीब जाने का अच्छा समय है।”
“हाँ, हाँ, दादा भाई चलो चलो। ८-१० दस दिन कहीं चलो, थोड़ा मूड अच्छा हो जाए। पुराना समय या वक़्त जा रहा है, नयापन नई उमंगता है। चारों ओर हरियाली व खुशहाली का सुहावना मौसम और ठंड के यह दिन हमें सीख देते हैं कि जो नया साल आ रहा है, वह नया उल्लास भी ला रहा है। वर्तमान में लोग तो शहरों में २ और २, ४ करने में लगे रहते हैं। काला-पीला करने में या व्यापार, नौकरी में जीवन को खपा देते हैं।”
“दादा भाई सही कह रहे हो। अब समय का अभाव सभी को रहता है, पर नेटवर्किंग साइट, सोशल साइट और लेपटॉप, कम्प्यूटर व मोबाइल ने मनुष्य की दिनचर्या को बदल दिया है, तभी तो परेशानी ज्यादा हो रही है। जितनी सुविधा मिलती है, उतनी पीड़ा शरीर को हो रही है बीमारी का तहखाना मानव शरीर हो गया। परिश्रम, रिश्तों में मिठास, आपस में मुलाकात, बोल-चाल के साथ हम लोगों ने शरीर को तपाना छोड़ दिया है। नए जमाने में नयापन बहुत बदलाव भी लाया है।” “परिवारिक दूरियों को इन चीजों ने बढ़ा दिया है प्रवीण। लोगों में आपसी ताल-मेल खत्म हो रहा है, बातचीत करने की फुर्सत नहीं है, लेकिन घंटों मोबाइल पर वक़्त खराब कर रहे हैं।”
“हाँ दादा भाई, इसलिए सफ़र अच्छा है सीखने के लिए और जीवन के रंगों के बारे में जानकारी लगती है, घूमने-फिरने से ही बात बनती है।”
“बीते वर्ष की यादों पर जरा विचार करें।”
हाँ, हाँ ठीक कहते हो आप। हमें तो जो बीत गया, उसे दिल से विदा करना ही होगा, क्योंकि साल दर साल जो चला जाता है, उसे जाने दो यारों, आशावादी बन कर अच्छे की तलाश में नए साल नए उल्लास पर जोर देना अच्छा है। सकारात्मकता, सफलता व वैचारिक भाव से सब अच्छा होना, और शुरुआत शुभ हो, इस पर ध्यान देना चाहिए। अंग्रेजी वर्ष हो या और कोई, हमारे लिए सभी आशाओं के सरोवर में ले जाने वाले हों। सब अच्छा हो, सब मंगल हो, सब शुभ हो, क्योंकि ‘बीत गया, सो बीत गया, नया साल नया उल्लास लाया।’ जीवन में चिंतन के साथ वैचारिक मंथन करना वक़्त का एक एहसास होता है, तभी तो भाई ‘सफ़र-ए-ज़िंदगी’ चलती रहती है। दिन, महीने, साल बीत जाते हैं और नया साल नई खुशियों की दस्तक देता है। तभी तो सब मिलकर मनाते और एक-दूसरे को नए वर्ष की शुभकामनाएं देते हैं।