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बातें मेरी ज़िंदगी की

ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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बातें उन दिनों की है, जब मैं छोटी थी, दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। पढ़ने में काफी तेज नहीं थी, मगर मन में हमेशा रहता था कि राज्य में अव्वल दर्जा लाऊं। इसलिए रात-दिन एक कर पढ़ती रहती थी। मुझे याद भी देर से होता था, इसलिए एक-एक प्रश्न के उत्तर हमेशा रटा करती थी। मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं दसवीं पास कर लूँ, उसके बाद मेरी शादी कर देंगे, क्योंकि चिट्ठी लिखना भर तो आना चाहिए, और लड़के वालों की उस समय की डिमांड ज्यादा होती थी। यह समय नब्बे के दशक का था।
खैर, समय आया परीक्षा भी हो गई। आखिर एक दिन परीक्षा का परिणाम भी घोषित हुआ। मैं प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई, पर अब मेरी पढ़ाई रुकने वाली थी। मेरी शादी भी कराई जानी थी, लेकिन मैं शादी नहीं करना चाहती थी। अब मैं एक डॉक्टर बनना चाहती थी। मैं अब भी पढ़ रही थी, जो कुछ भी पिछली पढ़ाई में छूट गया था, या फिर अगली के लिए मैं कुछ भूल ना जाऊं, इसलिए अब भी रटती रहती थी, ताकि अगली परीक्षा में औेर ज्यादा अंक ला सकूं। पढ़ाई की मेरी लगन देखकर माँ ने पिताजी से सिफारिश करके जैसे-तैसे वहीं के कालेज आई.एस.सी. में नामांकन करवा दिया। मैं बहुत खुश हुई और खुशी-खुशी अपनी पढ़ाई पूरी करती रही। पढ़ने में इतना मगन रहती थी, कि मेरी सहेली भी बहुत ही कम होती थी और ना ही किसी शादी, ब्याह, पर्व-त्योहार में शामिल होती थी, या फिर बहुत ही कम।
मेरा बचपन भी अकेले ही बीता।परिवार में २ छोटे भाई और माता- पिता थे। बस यही मेरी दुनिया होती थी, इतने में ही सिमट कर रहती थी।बाहर की दुनिया मुझे नहीं भाती थी। मुझे सजना-संवरना पसंद नहीं था, पर हाँ एक छोटी औेर कत्थई रंग की बिंदी मेरी पसंद की थी। वो कभी नहीं छूटी। आज भी मैं एक बिंदी बड़े चाव से लगाती हूँ। मेरे पर्स में १-२ पत्ते बिंदी आज भी जरूर मिल जाएगी।
पढ़ने की लगन इतनी रहती कि झाड़ू लगाते-लगाते कहीं कोई किताब का या कॉपी का पेज यदि मिल जाए तो उसे उसी समय पढ़ लेती या उस टुकड़े या ठोंगा को सहेज कर रख लेती, ताकि काम खत्म होते ही पढ़ सकूं। यहाँ तक कि न मैंने जाने कितनी ही बार दाल जला दी, चावल-सब्जी जला दी।इसके लिए मैं हमेशा डांट खाती रहती थी। रोटी बनाते समय चकले के नीचे कोई कागज का टुकड़ा या सामने कोई कॉपी-किताब जरूर रहती, जिसे रोटी बेलते-बेलते पढ़ लेती थी। रोटी भी जली अधपकी रहती थी।
एक दिन भी मैंने कालेज जाना नहीं छोड़ा। आखिर एक दिन ऐसा भी आया, जब बारहवीं की परीक्षा मैंने द्वितीय श्रेणी से पास कर ली।उसके बाद मेडिकल की परीक्षा भी दी, लेकिन ये आसान नहीं था। ना तो हमारे पिताजी के पास उतने पैसे थे, ना ही कोई सिफारिश और ना ही मैं मेधावी छात्रा थी। सो, मैं उतीर्ण नहीं हुई और फिर पढ़ाई भी बंद। पिताजी का कहना था कि लड़की अगर दसवीं पढ़ लेगी तो लड़का बारहवीं पढ़ा होना चाहिए। लड़की बारहवीं, तो लड़का बी.ए. होना चाहिए। जैसे-जैसे लड़का ज्यादा पढ़ा होगा, तो दहेज भी ज्यादा देना पड़ेगा, लेकिन मैं अभी औेर पढ़ना चाहती थी। सो, मैंने भूख हड़ताल कर दी, और भीतर ही भीतर पढ़ाई जारी कैसे रखूं, इसकी योजना भी बनाने लगी। उस समय बी.एस-सी. में नामांकन के लिए १ हजार रुपए चाहिए थे। मेरी जिद थी कि हर हाल में मुझे नामांकन करवाना ही है। उस समय मेरी एक सीनियर सहेली थी, जिसकी शादी हो चुकी थी मैंने उनसे कहा, तो वो मेरी मदद के लिए तैयार हो गई। इधर, भूख हड़ताल भी जारी थी। नामांकन के लिए अब अंतिम दिन आ चुका था। सो, उस सहेली ने मुझे १ हजार रुपए दिए। मैं बहुत खुश हुई, लेकिन अब तक मेरे माता-पिता भी आगे की पढ़ाई के लिए तैयार हो गए। मेरी भूख हड़ताल काम कर गई और मेरा नामांकन बी.एस-सी. (वनस्पति शास्त्र आनर्स) में करवा दिया गया।तब मैंने उनके पैसे वापस कर दिए। द्वितीय वर्ष में मेरी शादी भी करवा दी गई। अंतिम साल की पढ़ाई मैंने ससुराल में ही पूर्ण की। उसके बाद मैंने जूनियर डॉक्टर पैरामेडिकल की परीक्षा उत्तीर्ण की, पर जब नामांकन की बारी आई तो ना ससुराल वाले और ना ही मायके वालों ने कोई रुचि दिखाई। उसके बाद की पढ़ाई के लिए किसी दूसरे शहर जाना पड़ता, जो संभव नहीं था। फलस्वरूप मेरी पढ़ाई बंद हो गई। फिर जैसे ही मौका मिला, फिर से पढ़ाई शुरू की, पूरे १२ वर्ष बाद। मैंने पीजीडीआरडी का डिप्लोमा कोर्स किया, उसके बाद बी.एड. किया। फिर सी.टेट. ,एस.टेट. परीक्षा पास की।मैंने एम.एस-सी. करने की कोशिश की, पर सफल नहीं हो पाई। फिर एम.ए. हिन्दी से प्रथम श्रेणी से पूर्ण किया। उसके बाद मुझे कृषि विभाग में नौकरी करने का मौका मिला। आज मैं नौकरी करते हुए ही जब भी मौका मिलता है, कुछ न कुछ लिखती रहती हूँ। और हाँ, आज भी हारी नहीं हूँ। लगातार नेट की तैयारी में भी लगी हुई हूँ। इस बीच मेरी ज़िंदगी में काफी उतार-चढ़ाव भी आए, पर मैं कभी नहीं हारी और लगातार प्रयासरत हूँ कि कुछ और नया करने की गुंजाइश सदा बनी रहे।