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मैं मजदूर…

दिनेश चन्द्र प्रसाद ‘दीनेश’
कलकत्ता (पश्चिम बंगाल)
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जीवन संघर्ष (मजदूर दिवस विशेष)…

मैं मजदूर हूँ,
क्योंकि मेरे सर पर छत नहीं
न मेरे पैरों के नीचे जमीन है,
न खाने के लिए सूखी रोटी है
ना साथ में कुछ नमकीन है।

मैं मजदूर हूँ,
सुबह-सुबह उठकर
जाना पड़ता है काम पर,
नहीं तो भूखे रहना पड़ेगा
उपवास के नाम पर।

मैं मजदूर हूँ,
दिनभर परिश्रम
करने के बाद भी कभी-कभी,
खाली हाथ लौटना पड़ता है
चूल्हा जलाती है बीवी,
पानी का छौंक लगाती है
बच्चे समझते हैं,
कुछ बन रहा है खाना मिलेगा
और सोचते-सोचते सो जाते हैं।

मैं मजदूर हूँ,
कर्ज लेकर बीवी और बच्चों
के लिए कपड़ा खरीदा,
बूढ़े माँ-बाप के लिए दवा
बड़ी बेटी की शादी की
सूद में ही मालिक के यहाँ,
सुबह-सुबह हाजिरी लगा रहा हूँ।

मैं मजदूर हूँ,
मैं मारा गया हूँ, पीटा गया हूँ
मैं हड़पा गया हूँ, मैं शोषित हुआ हूँ,
मैं लांछित हुआ हूँ, बेइज्जत हुआ हूँ
और नहीं तो सोते हुए जलाया
और उजाड़ा गया हूँ,
हर किसी से सताया गया हूँ।

मैं मजदूर हूँ, मैं मजदूर हूँ,
मेरे नाम पर मई दिवस मना लीजिए।
कल से फिर मेरे हाल पर
छोड़ दीजिए॥

परिचय– दिनेश चन्द्र प्रसाद का साहित्यिक उपनाम ‘दीनेश’ है। सिवान (बिहार) में ५ नवम्बर १९५९ को जन्मे एवं वर्तमान स्थाई बसेरा कलकत्ता में ही है। आपको हिंदी सहित अंग्रेजी, बंगला, नेपाली और भोजपुरी भाषा का भी ज्ञान है। पश्चिम बंगाल के जिला २४ परगाना (उत्तर) के श्री प्रसाद की शिक्षा स्नातक व विद्यावाचस्पति है। सेवानिवृत्ति के बाद से आप सामाजिक कार्यों में भाग लेते रहते हैं। इनकी लेखन विधा कविता, कहानी, गीत, लघुकथा एवं आलेख इत्यादि है। ‘अगर इजाजत हो’ (काव्य संकलन) सहित २०० से ज्यादा रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपको कई सम्मान-पत्र व पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। श्री प्रसाद की लेखनी का उद्देश्य-समाज में फैले अंधविश्वास और कुरीतियों के प्रति लोगों को जागरूक करना, बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा देना, स्वस्थ और सुंदर समाज का निर्माण करना एवं सबके अंदर देश भक्ति की भावना होने के साथ ही धर्म-जाति-ऊंच-नीच के बवंडर से निकलकर इंसानियत में विश्वास की प्रेरणा देना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-पुराने सभी लेखक हैं तो प्रेरणापुंज-माँ है। आपका जीवन लक्ष्य-कुछ अच्छा करना है, जिसे लोग हमेशा याद रखें। ‘दीनेश’ के देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-हम सभी को अपने देश से प्यार करना चाहिए। देश है तभी हम हैं। देश रहेगा तभी जाति-धर्म के लिए लड़ सकते हैं। जब देश ही नहीं रहेगा तो कौन-सा धर्म ? देश प्रेम ही धर्म होना चाहिए और जाति इंसानियत।