सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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बोलो मोहन
कब तक मौन,
दर्शक बने रहोगे ?
कोई वेदना
क्यों छूती नहीं चेतना,
पीर कब दूर करोगे ?
घर बाहर
कहाँ जाऊँ किधर,
कब पुकार सुनोगे ?
कैसे क्या करूँ
स्वयं को सुरक्षित रखूँ,
संबल कब तुम बनोगे ?
अति हो गई
धरती शर्मिन्दा हो गई,
अब कब समझोगे ?