प्रो. सुभाष शर्मा
मेलबोर्न
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आज मैं ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न शहर में रहता हूँ। एक इंजीनियर हूँ; और ऑस्ट्रेलिया की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी में पढ़ाता हूँ| यहाँ रहते हुए हर काम अंग्रेजी मे करता हूँ। अंग्रेजी बोलता हूँ, अंग्रेजी पढ़ता हूँ और अंग्रेजी ही लिखता हूँ।आज यूँ ही बैठे-बैठे एक स्मृति-चित्र अचानक स्मृति पटल पर उभर आया।
साल १९६४, जाड़े का सर्द समय। देश एक करवट बदल रहा था। जहाँ एक ओर हमारे पूरे क्षेत्र में हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने के लिए भावनाएँ उफान पर थीं, वहीं दूसरी ओर दक्षिण भारत में उसके विरोध में जबर्दस्त आंदोलन हो रहे थे। दक्षिण भारत में हिन्दी के विरुद्ध आंदोलन में एक विद्यार्थी ने आत्मदाह कर लिया था। अलीगढ़ शहर में उस समय धर्म समाज डिग्री कॉलेज के स्टूडेंट लीडर ओम प्रकाश गौतम आए थे ; और हम सबको भाषण देकर गए थे कि हमें भी हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने के लिए जुलूस में शामिल होना चाहिए। रेलवे स्टेशन के सामने एक शामियाना लगाया गया था ; वहाँ पर नेताओं ने भाषण दिए, जिसमे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के अध्यक्ष और कई और स्टूडेंट लीडर भी आए थे। उन्होंने आह्वान किया कि हम इंटर कालेज के छात्रों को भी हिन्दी को राष्ट्र भाषा स्थापित करने के लिए आवाज उठानी चाहिए। मैं नेताओं के तर्क सुनकर बहुत प्रभावित हुआ और सोचा एक देश की अपनी एक भाषा होनी ही चाहिए।
दूसरे दिन मैं अपने स्कूल गया। हम तीन-चार लोगों के साथ मिलकर निर्णय लिया कि हम आज सुबह प्रार्थना सभा के समय ‘हिन्दी भाषा अमर रहे, हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा हो, अंग्रेजी का बहिष्कार हो’ इस तरह के नारे लगाएंगे। प्रार्थना के ठीक बाद मैंने जैसे ही नारे लगाने शुरू किए, अन्य कक्षाओं के विद्यार्थी भी नारे लगाने लगे। मेरे साथी जीवन शर्मा, जो जाने-माने आर्य समाजी, शिवकुमार शास्त्री, जो प्रकाश वीर शास्त्री जी के गुरु थे, उनके भतीजे थे। वे मेरे अनन्य मित्र जय प्रकाश, जिन्हें हम जस्सो कहते थे, वह भी साथ लग लिए। जस्सो के बाबा भी हमारे स्कूल से ही प्रिंसिपल के पद से रिटायर हुए थे और राष्ट्रवादी व्यक्ति थे। यद्यपि, हमारे अध्यापकों ने हमें रोकने की कोशिश की, पर हम सब विद्यार्थियों की प्रार्थना सभा जुलूस में परिवर्तित हो गयी।
मैं स्कूल से बाहर, आगे-आगे सड़क पर निकल कर एक दीवार पर चढ़ गया; और उस पर खड़ा होकर विद्यार्थियों को संबोधित करने लगा। मैं कल ही बी.एच.यू. के लीडर्स के जो भाषण सुन कर आया था, वही बातें मिला-जुला कर भाषण देकर विद्यार्थियों को उत्तेजित करने लगा। यह मेरा सड़क पर पहला भाषण था, इससे पहले मैं और जीवन शर्मा वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लिया करते थे; और हमारा भाषण का अभ्यास क्लास तक ही सीमित था। जीवन वाद-विवाद प्रतियोगिता में ओजस्वी शैली अपने चाचा जी और प्रकाशवीर शास्त्री जैसे प्रयोग करते थे; और मुझे आर्य समाज के नेताओं के भाषण सुनाने ले जाते थे। और उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता था। वे वाद-विवाद प्रतियोगिता में बहुत अच्छी तरह बोलते थे; पर लोगों के बीच बोलने में थोड़े झिझकते थे। अक्सर मुझे बड़े वक्ताओं के भाषण के जोशीले वाक्य सुनाते थे, मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता था।
मैंने उनसे बागडोर संभालने को कहा तो उन्होंने मुझे ही आगे कर दिया। फिर क्या था, हम सड़क पर आ गए और हमने जैसे ही कहा, हम विदेशी भाषा में लिखे साइन बोर्ड और नेमप्लेट को बर्दाश्त नहीं करेंगे। बस विद्यार्थियों ने तय किया, कि जो भी साइन बोर्ड या नेम प्लेट अंग्रेजी मे दिखाई दे, उस काला पोत दो।रोड पर मरम्मत का काम चल रहा था, इसलिए हमको फ्री का तारकोल मिल गया। फिर क्या था, कुछ टायर की दुकान, परचून की दुकान, जहां अंग्रेजी में लिखा दिखा पोत दिया। सामने ही शहर का मशहूर जगन्नाथ दूदाधर का पेट्रोल पम्प था; और उनका बड़ा-सा बोर्ड हमारे साथियों ने मेरे ओजस्वी भाषण के साथ ही पोतना शुरू कर दिया। मैंने उनकी अंग्रेजी में लिखी नेमप्लेट भी अपने हाथ से काली पोत दी।
मजे की बात यह कि मैं उनके ऑफिस में कुछ दिन पहले ही अपने जीजा जी के साथ उनके यहाँ आया था। मेरे जीजा जी ईएसआई के इन्स्पेक्टर थे, सो उनके साथ हम भी चाय नाश्ता किया, पर आज मुझे हिन्दी का ऐसा नशा चढ़ा था कि न मैं उनमें से किसी को ; और न उनमें से कोई मुझे पहचान रहा था (मुझे ऐसा लग रहा था)। बाद में पुलिस आई और हम सबको डांट-डपट कर तितर-बितर कर दिया। तय किया गया, कि शाम को रेलवे स्टेशन पर टेंट में जाएँगे, सुना है वहाँ पर लोग भूख हड़ताल पर बैठने वाले हैं ; इसलिए नारेबाजी करेंगे और उनका उत्साहवर्धन करेंगे, साथ ही अन्य शहरों से आए नेताओं के भाषण भी सुनेंगे।
मेरी बहन मेरा सुरक्षा कवच थीं, मैंने उनको समझा दिया कि मै हिन्दी के जुलूस में जाऊँगा, पर जीजा जी को मत बताना। हो सकता है घर भी देर से आऊँ तो कह देना कि जस्सो (जय प्रकाश) के घर पढ़ रहा होगा ; और मेरी बड़ी बहन ने ऐसा ही किया।
इधर, मैं जब टेंट में आया तो जोशीले भाषण हो रहे थे और जो लोग भूख हड़ताल पर बैठ रहे थे, उनके नाम के साथ तालियाँ बजतीं और माला पहनाई जा रही थी।ओमप्रकाश गौतम से मैंने कहा, ” भैया, यह क्या आमरण अनशन पर बैठ रहे हैं ; वे बोले, नहीं २४ घंटे के अनशन पर हैं, बोलो क्या तुम भी आंशिक अनशन पर बैठोगे ? मैंने कहा क्यों नहीं, पर क्या मैं भी बैठ सकता हूँ ? फिर क्या माला मुझे भी पहना दी गई और जय-जयकार होने लगी। मैंने नारा लगाया, “राष्ट्रभाषा हिन्दी अमर रहे।”
इधर, दूदा धर जी शाम को घूमते-घामते मेरे घर पहुंचे और जीजा जी से बोले, “पांडे जी आज आपके साले ने मेरा बहुत नुकसान करा दिया।” उन्होंने पूछा तो बताया कि वह आया और मेरी कम्पाउन्ड वाल पर चढ़ कर जोशीले भाषण देने लग गया और लड़कों ने मेरे सारे अंग्रेजी के बोर्ड पोत डाले। आपके साले ने मेरी नेमप्लेट तारकोल से पोत दी।” मेरे जीजा जी ने कहा, “लाला जी आपको गलतफहमी हो गयी होगी, मेरा साला तो पढ़ने- लिखने वाला लड़का है; अभी हाईस्कूल में गुड सेकंड डिवीजन पास हुआ है। लगता उसकी शक्ल से मिलता-जुलता और कोई लड़का होगा।” वे बोले, “पांडे जी अभी १०=१२ दिन पहले ही तो आप साथ में उसे मेरे ऑफिस लाए थे, बैठ के चाय और नाश्ता किया था आँखें इतनी कमजोर नहीं है।”
जीजा जी ने दूदाधर जी को आश्वासन दिया, “उसे घर आने दो खबर लेता हूँ।” मेरी बहन ने दूदाधर जी की भी खूब खातिरदारी की, ताकि कोई बात सर पर आ ही जाए तो वे मेरे भाई के ऊपर रहम खायेंç। अब मेरे जीजा जी मेरा इंतजार करने लगे, जब रात के ग्यारह बज गए और मैं नहीं आया, तब वे जस्सो के घर पहुंचे, पूछने पर उसने कहा अंकल वह स्टेशन पर भूख हड़ताल पर बैठा होगा। अब मेरे जीजा जी ने आव देखा न ताव, और निकल पड़े। १२ बजे रात वे स्टेशन पर पहुंचे, बस वही समय था कि मेरी १२ घंटे की आंशिक भूख हड़ताल बस खत्म ही हुई थी। जीजा माहौल देख कर थोड़े ढीले पड़ गए और बोले यह सब क्या हो रहा है, क्या तुम्हें चच्चा ने मेरे पास इसलिए पढ़ने भेजा है ? मैंने कहा कुछ नहीं, बस हिन्दी के लिए आंदोलन चल रहा था, सो मै भी आ गया।
उन्होंने लोगों के सामने ज्यादा कुछ नहीं कहा, पर पूरे रास्ते मुझे लताड़ते हुए घर ले आए। बार-बार कह रहे थे, चच्चा सोच रहे होंगे, लड़का पांडे जी के संरक्षण में है, उन्हें क्या पता कि लड़का नेतागिरी कर रहा है। ऊपर से इसे और किसी का बोर्ड और नेमप्लेट पोतने को नहीं मिला, मेरे ही जान-पहचान वाले शहर के इतने प्रतिष्ठित व्यक्ति का नुकसान कर आया।
उन्होंने कहा, “कल जाकर उनसे माफी मांग कर आना, मैं कुछ नहीं बोला, पर दूसरे दिन दूदाधर जी को जीजा जी ने फोन किया कि मैंने उससे बात कर ली है, और कह दिया है कि आपसे माफी माँगने जाए। वे बोले, “पांडे जी उसे मत भेजना, आप नहीं जानते वह बहुत खतरनाक है। वह भाषण देते ही तो आपा खो देता है; और लड़के तोड़-फोड़ शुरू कर देते हैं। अगर उसने मुझसे दुश्मनी ले ली तो वह खुद नहीं आएगा, २-४ गुंडे लड़के और भेज देगा। बस बहुत हो गया उससे कहना अगली बार ध्यान रहे. ऐसी शिकायत दुबारा सुनने को न मिले।”
एक अरसा गुजर गया। तब मैं नॉर्वे में था। मुझे नॉर्वे की यूनिवर्सिटी में काम करने का मौका मिला। आग में घी तब पड़ा, जब वहाँ एक टेकनीशियन ने मुझे झाड़ दिया, “तुम १ अरब लोग भारत में रहते हो, तुम्हारी एक भाषा नहीं है। तुम अपने भारतीय मित्रों से अंग्रेजी में बात क्यों करते हो ? हम नॉर्वेजियन ४० लाख हैं, पर हमें अपनी भाषा पर गर्व है ; और तुम्हारे जैसे मुल्कों के लोग हमारे यहाँ पढ़ने आते हैं।” रही-सही कसर मेरे अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना के डीन ने पूरी कर दी। मैं वहाँ पर असिस्टेंट प्रोफेसर था। वे देखते थे अक्सर मैं भारतीय मित्रों से अंग्रेजी में और पाकिस्तानियों से हिन्दी/उर्दू मे बात करता था। उन्होंने भी मुझे झकझोर दिया, “तुम ऐसा क्यों करते हो, तुम्हारे देश की अपनी एक भाषा नहीं है ? वे स्वयं जर्मन मूल के थे ; और लोगों से या तो जर्मन या अंग्रेजी में बात करते थे। ऐसे किस्से मेरे जीवन में, मेरे इर्द-गिर्द सदा घूमते रहे। मेरा विचार था कि मै विदेश में कभी नहीं बसूँगा। मेरे बहुत प्रयासों के बावजूद भी जहाँ का दाना-पानी लिखा होता हैं, वहीं जाना पड़ता है। मैं विदेश जाना तो चाहता था, पर वहाँ बसना नहीं चाहता था, पर किस्मत की बात देखो कि मुझे परिवार की जिद पर आस्ट्रेलिया में बसना पड़ा।
अब मैं यही सोच रहा हूँ, कि बचपन में जो बात दिमाग़ में घर बना ले, वह जीवनभर साथ रहती हैं| कहाँ तो मैं अंग्रेजी की खिलाफत करता था ; और आज मुझे विदेश में बसने का संयोग मिला। एक ओर हिन्दी के लिए आंदोलन और फिर विदेश में बस कर अंग्रेजी में लिखना-पढ़ना और पढ़ाना पर बिडम्बना नहीं तो और क्या है। बचपन की वे बातें मस्तिष्क में इस तरह घर कर गई हैं। भले ही परिस्थितियाँ बदल गई हैं ; लेकिन हिन्दी के प्रति मेरा जुनून आज भी कम नहीं हुआ है। आज भी भारतीय कार्यक्रमों में मैं हिन्दी में ही बोलता हूँ। भारतीय दूतावास और कॉन्सुलेट में पूरा पत्राचार हिन्दी में ही करता हूँ। मेरे कोंसुल जनरल मित्र अक्सर कहते हैं, “यार तुम पूरे शहर में यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी बोलते हो और हमारे ऑफिस में हिन्दी में ही पत्राचार करते हो। यार तुम्हारे चक्कर में मेरे स्टाफ की भी अच्छी परेड होती है।भारत सरकार का नियम है कि हिन्दी में पत्र का जबाब सरकारी दफ्तर से हिन्दी में लिखना पड़ेगाl। हालांकि, यह भी सच है कि मुझे और मेरे स्टाफ को गर्व भी होता है कि चलो विदेश में रह कर कोई भारतीय हिन्दी बोलने और लिखने के लिए लोगों को प्रेरित करता है।
मेरा प्रयास होता है कि विदेश में जो भी व्यक्ति भारतीय मूल का प्रतीत हो, उससे सबसे पहले हिन्दी में ही बोलने का प्रयास किया जाए ।किसी के भी घर जाता हूँ तो बच्चों से भी हिन्दी में बोलने का प्रयास करता हूँ। अपने शहर के भारतीय कांसुलेट के माध्यम से हिन्दी दिवस तथा विश्व हिंदी दिवस पर हिंदी लेख कविता पाठ के आयोजन में हिस्सा लेता हूँ। मन में हिन्दी के बीज अब पेड़ का रूप धारण कर चुके हैं ; और अब एक ही आकांक्षा है कि हिन्दी विदेशों मे संपर्क भाषा के रूप में लोग प्रयोग करें। मुझे अच्छी तरह मालूम है कि भारत में बच्चे अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करते हैं, पर मैं और मेरा संगठन बच्चों में यह भावना भरने की कोशिश करता है कि हम यहाँ भारतीय-ऑस्ट्रेलियन की तरह से जाने जाते हैं। हम कितनी अच्छी अंग्रेजी बोल लें, हिन्दी का हर शब्द भी भूल जाएँ, फिर भी हमें यहाँ के निवासी अंग्रेज नहीं मानेंगे। वे हमारा सम्मान तभी करेंगे, जब हम उन्हें विशेष अवसरों पर अपनी वेशभूषा, संस्कृति, गीत-संगीत, भोजन इत्यादि का प्रयोग करते दिखें।
पहले के भारतीय कम संख्या में किसी भी देश में बसे होते थे अतः वह भारत के अन्य प्रदेश के लोगों के साथ अंग्रेजी में बातचीत करते थे। आज कारीगर, वर्कर, अध्यापक, वैज्ञानिक सब तरह के लोग जाते हैं ; और उनकी संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। उनका मन अंग्रेजी छोड़ कर अपनी भाषा बोलने को करता है, अतः हम भारतीय मूल के लोगों को हिन्दी संपर्क भाषा के रूप में ठीक वैसे ही, जैसे हम अरब देशों में बोल कर अपनी भारतीयता की पहचान बनाते हैं अन्य देशों मे भी बनानी चाहिए।
(वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुम्बई )