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राष्ट्र भाषा हिन्दी की शिराओं में संचार करती हैं जनपदीय भाषाएं – डॉ. शर्मा

उज्जैन (मप्र)।

हिंदी और भारतीय भाषाओं का आधार भारत में बोली जाने वाली डेढ़ हजार से अधिक भाषाएँ और बोलियाँ हैं। कोई भी भाषा तब तक भाषा नहीं बनती, जब तक उसका बोलियों के साथ संबंध नहीं बनता। जनपदीय भाषाएँ राष्ट्रभाषा हिंदी की शिराओं में संचार करती हैं। हिंदी का भविष्य जनपदीय भाषाओं और देवनागरी लिपि के सशक्त आधार पर ही निर्मित होगा।
      संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना (उज्जैन) के तत्वावधान में हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी में यह बात ‘वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हिंदी एवं नागरी लिपि’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. शैलेंद्र कुमार शर्मा (कुलानुशासक एवं विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, सम्राट विक्रमादित्य विवि, उज्जैन) ने कही। आयोजन में नागरी लिपि परिषद् के महामंत्री डॉ. हरिसिंह पाल ने कहा कि शैक्षिक संस्थानों और भारत सरकार के प्रयासों से हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़ा और हिंदी माह जैसे आयोजन अब नियमित रूप से होते हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि नागरी लिपि विश्व लिपि बनेगी और हिंदी भाषा संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनेगी। हरेराम वाजपेयी (प्रचार मंत्री, मध्य भारत हिंदी समिति एवं संस्थापक हिंदी परिवार इंदौर) ने  कहा कि ‘वीणा’ पत्रिका में रोमन लिपि के विस्तार पर चिंता व्यक्त की गई थी, जो आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने कविता भी सुनाई।
    इस अवसर पर डॉ. पाल और श्री वाजपेयी का सारस्वत सम्मान किया गया। संचेतना के संरक्षक डॉ. बी.के. शर्मा ने कहा कि तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत की नई पीढ़ी को भी हिंदी पढ़ने की व्यवस्था होनी चाहिए। डॉ. शहनाज शेख ने कहा कि तकनीकी और डिजिटल युग में भी देवनागरी लिपि खरी उतरती है। श्रीमती सुवर्णा जाधव ने भाषा की शुद्धता पर बल दिया। डॉ. रणजीत सिंह ने देवनागरी को वैज्ञानिक लिपि बताया।
  सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। स्वागत भाषण डॉ. श्वेता मिश्रा ने दिया। प्रस्तावना डॉ. शहनाज शेख ने प्रस्तुत की।
आयोजन का संचालन डॉ. रश्मि चौबे ने किया।