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सचेत होकर बचेंगे मानवीय मूल्य

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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मानवीय मूल्यों से नाता तोड़ कर जिस नव संस्कृति से हम इठला रहे हैं, वह हमारी अस्मिता को ही समाप्त करती जा रही है। हमें अपनी संस्कृति को बचाने के लिए सचेत होने की ज़रूरत है।अनुशासन और मर्यादा का एवं हमारी संस्कृति और सभ्यता का क्षरण होता जा रहा है। जब समाज में यह हलकापन, गरिमाहीनता, संकीर्णता और आत्मकेन्द्रित प्रवृत्ति बढ़ रही है, तो स्वाभाविक है कि हिंदी साहित्य में भी वह वज़नदारी नहीं है। लेखकों की बाढ़ आयी हुई है, पर उनमें कितना साहित्य और पठनीय है, यह कहना कठिन है।
छोटी-छोटी जगहों में बहुत अच्छा साहित्य लिखा जा रहा है, किन्तु यह महानगरीय खेमे में सम्मिलित नहीं हैं, इसलिए इनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।
दुर्भाग्य यह है, कि हमारे नैतिक मूल्यों का निरंतर पतन हो रहा है, अवसरवादी प्रवृत्ति बढ़ रही है। हम आत्म-अवलोकन की परिभाषा भूल गए हैं और आरोप लगाना सबसे आसान तरीका हो गया है।
मानवीय मूल्यों के प्रति गंभीर होना और उसे बचाने के प्रति सचेत होना बहुत जरूरी है और इसके लिए नए लेखकों को प्रोत्साहित करना चाहिए। किस तरह हम नए परिवेश में अपने मानवीय मूल्यों के साथ आगे बढ़ सकते हैं, इस विषय में रचनाएँ आमंत्रित करें, परिचर्चा रखें तथा जन-संपर्क के माध्यम से इस विषय को संबल प्रदान करने की कोशिश अति अनिवार्य है। कुछ रचनाकार की रचनाओं में अतीत की घनी छाया है तो वर्तमान का संघर्ष भी और भविष्य की पदचाप भी। सही मायने में वे समाज के लिए एक स्वच्छ और सभ्य वातावरण बनाने की चेष्टा में प्रयासरत हैं।

विकास के गगन में उड़ान भरना आवश्यक है, पर संवेदनहीन होकर नहीं। ज्ञान तभी सार्थक होता है, जब हृदय में संवेदना हो; अन्यथा मानव और रोबोट का अंतर मिट जाएगा।