पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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मेरे भाग्य विधाता (शिक्षक दिवस विशेष )…
भारतीय संस्कृति में गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। पारंपरिक रूप से ‘शिक्षक’ शब्द सुनते ही कक्षा की दीवार पर लगा ब्लैकबोर्ड और उस पर चॉक से लिखती हुई किसी शिक्षिका या शिक्षक का चेहरा आँखों के समक्ष उभर आता है।
शिक्षक दिवस भी हम अधिकतर उन्हीं शिक्षकों के साथ मनाया करते हैं, जिनसे पहले कभी हमने पढ़ा होता है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या स्कूल-कॉलेज के बाद हम लोग सीखना बंद कर देते हैं या फिर हम सब उतना सीख चुके होते हैं, जिन्हें सीखने के बाद जीवन में कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं होती। सच तो यह है, कि सीखना तो आजीवन सीखने वाली प्रक्रिया है। असली सबक तो हमारा तभी शुरू होता है, जब जीवन अपने पूरे दम-खम के साथ हमारे सामने उपस्थित होता है। हम सभी अनजाने में ही हर पल, हर दिन कुछ ना कुछ सीखते ही रहते हैं। इसी सीखने से हमारा व्यक्तित्व विकसित और प्रभावशाली बनता है।
शिक्षक की पारंपरिक परिभाषा से निकल कर देखिए, तो जीवन के हर मोड़ पर कोई ना कोई शिक्षक खड़ा दिखाई देगा। यह भी आवश्यक नहीं है, कि कोई हमारे पास आकर शिक्षा दे या पढ़ाए। ट्रेन की सीट पर सिर टिकाए सोते हुआ किसी थके हुए व्यक्ति के ठहरने और शरीर के संकेत समझने का सबक दे जाता है। किसी कर्मचारी का नित्य समय पर आना हमें अनुशासन का सबक दे जाता है। सुबह की सैर पर नियमित दिखने वाला अनजान चेहरा उसकी निरंतरता, अनुशासन और उसकी एकाग्रता का सबक हम चुपचाप ले लेते हैं। ऑफिस में कोई अपने काम में निष्ठा दिखाता है तो कोई रोज गलती करता, सीखता है फिर आगे बढ़ने की कोशिश करता है। ये हमें गिर कर उठना सिखाता है।
इसी तरह समाज भी हमें हर पल सिखाता है। अच्छी आदतें और गुण हम किताब पढ़ कर नहीं सीख सकते, वरन् यह हमारे व्यवहार से अगली पीढ़ी तक पहुँचती हैं। जैसे जापान में सड़क पर कचरा फेंकना नियम नहीं, सामाजिक व्यवहार का हिस्सा है।भूटान में प्रकृति और पर्यावरण से प्रेम वहाँ के जीवन का हिस्सा है। पेड़, पौधों और पर्यावरण के प्रति प्रेम एवं संवेदनशीलता कोई बाहर से आया व्यक्ति भी सीखता है कि प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं है, वरन् अपना साथी और सहचर की तरह से है।
आजकल कृत्रिम बुद्धिमता (ए.आई.) की बात बहुत हो रही है, तो इससे भी हम सीख सकते हैं कि किसी भी प्रश्न को तुरंत खारिज न करके उसका समाधान खोजने की कोशिश करते रहना है। विभिन्न दृष्टिकोण से विचार करने की कोशिश करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि तकनीक मनुष्य की जगह नहीं ले सकती, लेकिन हमें याद दिलाती है कि सहानुभूति, धैर्य और पूर्वाग्रह बिना किसी की बात सुनना कितना मूल्यवान मानवीय गुण है।
शिक्षक दिवस शिक्षक के प्रति कृतज्ञता के साथ-साथ अपने अंदर हमेशा सीखने की आदत को बनाए रखने का भी दिन है, और साथ में कामना यह भी है कि सीखते-सीखते हमारा व्यक्तित्व भी ऐसा बन जाए कि हमारी उपस्थिति से किसी दूसरे के हिस्से में कोई छोटी सी सीख आ सके। नमन हर उस व्यक्ति, अनुभव एवं असहमति को; जिससे हमें कुछ भी सीखने को मिला।