पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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आज से ७ दशक पूर्व १४ सितंबर १९४९ को हिंदी भाषा को संविधान की राजभाषा के रूप में स्वीकृत किया गया… उसी दिन की स्मृति में पूरे देश में ‘हिंदी दिवस’ और ‘हिंदी पखवाड़ा’ मनाया जाता है, जिसमें प्रत्येक वर्ष हिंदी के उत्थान के विषय में बड़ी-बड़ी कार्यशाला और भाषण प्रतियोगिता आदि का आयोजन किया जाता है, परंतु फिर सब ठंडे बस्ते के अंदर रख कर बंद कर दिया जाता है।
◾राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा-
“हिंदी ने हमें गूँगेपन से बचाया है…” ऐसा महात्मा गाँधी का कहना था। इस हिंदी भाषा की अस्मिता ने राष्ट्रीय एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लोगों के कौशल, उनकी भावनाओं और ज्ञान को प्रगट करने में यह बहुत ही सहायक सिद्ध हुई है। देश के स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी भाषा ने अमूल्य योगदान किया है। जय हिंद और वंदे मातरम् का नारा आज भी देश भक्ति की भावना जनसमूह में जगाने में कामयाब हो जाता है।
हिंदी भाषा को देश के लगभग ३ चौथाई लोग बोलते और समझते हैं। हिंदी को १२ राज्यों में प्रथम भाषा और ११ राज्यों में द्वितीय भाषा का दर्जा प्राप्त है। हिंदी भाषा की विशालता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि हिंदी १८ बोलियों का सम्मिलित समूह है और हमारी हिंदी भाषा स्थानीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक अपनी पहुँच बना रही है। शिक्षाविद संस्कृतनिष्ठ भाषा का प्रयोग करते हैं। इस वजह से आम आदमी हिंदी भाषा से अपने को अलग-थलग सा महसूस करता है। हमारे हिंदी विद्वानों, हिंदी विभागों और साथ में सरकार को भी इस समस्या के निवारण के लिए कदम उठाने की आवश्यकता है।
◾भूमंडलीकरण ने हिंदी के बाजार को विकसित किया-
हिंगलिश शब्द हिंदी और इंग्लिश के मिश्रण से उत्पन्न हुआ है, जो बाजारवाद की देन है। दुनिया के कई देशों में हिंदी व्यापार की भाषा बन गई है। हिंदी का बाजार लगभग ३३ देशों में फैला हुआ है। जानकर आश्चर्य होगा, कि इंग्लिश में यह ताकत अभी भी नहीं है। हिंदी फिल्मों का बाजार दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा है। इससे करोड़ों ₹ की आमदनी भी हो रही है।
वैश्विक स्तर पर वही भाषा टिक पाएगी, जिसका शब्द भंडार या शब्द कोष बड़ा हो, उस भाषा में औदार्य भी होना आवश्यक है, ताकि वह अपना शब्द भंडार निरंतर बढ़ाता रहे। इस परिप्रेक्ष्य में हिंदी का सौभाग्य रहा कि भारत में तुर्क, मंगोल, अफगान, मुगल, फ्रांसीसी, पुर्तगीज और विशेष कर अंग्रेजों का शासन रहा। उन लोगों ने अपनी भाषा में अपना दरबार चलाया और देश पर शासन किया। इसके परिणामस्वरूप हिंदी भाषा शासकीय भाषा से प्रभावित भी हुई और उसका शब्द भंडार जो संस्कृत भाषा के शब्दों से पहले ही काफी समृद्ध था, वह इन सबके प्रभाव से और भी संपन्न और समृद्ध होता गया।
◾हिंदी भाषा की चुनौतियाँ-
इस समय हिंदी भाषा की सबसे बड़ी चुनौती मीडिया से उत्पन्न हिंगलिश भाषा से मिल रही है। मीडिया अपने लाभ को ध्यान में रख कर हिंगलिश का प्रचार-प्रसार कर रहा है। हिंगलिश के कारण हिंदी के लिए अपनी शुद्धता बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है। वैश्वीकरण के दौर में अंग्रेजी भाषा को ज्यादा बल मिल रहा है। फिल्मों में हिंदी के साथ इंग्लिश के प्रयोग के कारण अशुद्धता बढ़ती जा रही है।
◾कुछ विषयों का हिंदी में उपलब्ध न होना-
यह एक बड़ी समस्या है कि मशीनी अनुवाद क्लिष्ट होता है और पर्याप्त नहीं है कि वह पाठकों की माँग को पूरा कर सके। एक महत्वपूर्ण समस्या है, कि शोध और अनुसंधान के लिए हिंदी में शोध अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि शोधार्थी को इंगलिश में ही शोधार्थी का कार्य करना पड़ता है ।
विज्ञापन बाजार हिंदी के लिए दिन-ब-दिन नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहा है, जिसके तहत एक वर्ग विशेष को लुभाने के लिए विज्ञापन और उत्पाद का नाम अँग्रेजी में प्रचारित करता रहता है।
ऐसे में हिंदी भाषा की चुनौतियों से निपटने के लिए उसे बोलचाल और व्यवहार की भाषा बनाया जाए। अभिव्यक्ति का माध्यम सुदृढ़ किया जाए। सर्वप्रथम हिंदी भाषा को रोजगार की भाषा बनाया जाए। हिंदी भाषा के माध्यम से युवक-युवतियों को रोजगार परक कौशल प्रशिक्षण दिया जाए। विज्ञान की भाषा बनाने का प्रयास किया जाए। हिंदी में क्लिष्ट शब्दों की जगह सरल शब्दों का प्रयोग किए जाने पर बल दिया जाए। विभिन्न राष्ट्रों के विश्वविद्यालयों के साथ अनुबंध किया जाए, जिससे विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग की स्थापना हो सके ।
अँग्रेजी भाषा पर निर्भरता कम करके भी हिंदी का विकास किया जा सकता है। जब जापान और चीन आदि राष्ट्र बिना अंग्रेजी के आत्मनिर्भर हो गए तो हम क्यों नहीं हो सकते। हिंदी भाषा के प्रति लोगों के संकुचित नजरिए को बदलने की आवश्यकता है।
हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रांतीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर (जैसे सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, टी.वी., सिनेमा, हिंदी
में) शासकीय और गैर शासकीय कार्यों का संपादन अनिवार्य रूप से हिंदी में किया जाए।
हिंदी भाषा को सरल और समृद्ध बनाने के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करके हिंदी में अनुवाद को बढ़ावा दिया जाए। क्षेत्रीय भाषाओं की रचनाओं के हिंदी में अनुवाद के साथ विदेशी भाषाओं की रचनाओं के भी हिंदी में अनुवाद को प्राथमिकता दी जाए।
◾इंटरनेट पर हिंदी के १५ से ज्यादा सर्च इंजन-
अच्छी बात यह है, कि इंटरनेट से हिंदी को नई ताकत मिली है। भारतीय युवाओं के स्मार्ट फोन में औसतन ३२ एप्लिकेशन होते हैं, जिनमें से ८-९ हिंदी के हैं।
इंटरनेट की दुनिया में हिंदी को बढाने में यूनिकोड ने अहम् भूमिका अदा की है। इससे इंटरनेट पर हिंदी में काम करना आसान हो जाता है।
अन्तर जाल (इंटरनेट) पर हिंदी के बढते कदम से भविष्य के प्रति आशा की झलक दिखाई पड़ती है।
हिंदी को राजभाषा घोषित हुए ७६ वर्ष पूरे होने वाले हैं। यह जनसंपर्क की भाषा तो बन चुकी है, परंतु राजनीतिक कारणों से राष्ट्र भाषा ऩहीं बन पाई है।
आज के सूचना प्रोद्योगिकी युग में हमें हिंदी के पाठ्यक्रम को आई.टी. आधारित बनाने की जरूरत है । हिंदी सॉफ्टवेयर के विकास पर काम हो। हिंदी के विकास में लगे सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों को एक मंच पर आकर वर्ष में कम से कम १ बार हिंदी भाषा की मुश्किलों और चुनौतियों और उनके निराकरण के उपाय पर कारगर रूप से चर्चा करके कार्यान्वित करना होगा। बेहतर हिंदी शिक्षकों को सम्मानित करना चाहिए।
यदि भारत वर्ष को एक विकसित अर्थव्यवस्था बनाना है, तो उसे हिंदी को कार्यपद्धति, शिक्षा, ज्ञान, कौशल, व्यापार, मीडिया और बाजार की भाषा बनाना ही होगा। ऐसा किए बिना यह देश न तो सम्पन्न बन सकता है, न ही समतामूलक, न ही महाशक्ति और न ही विकसित अर्थ व्यवस्था। हिंदी को राजभाषा से राष्ट्र भाषा बनाने से पहले उसे जनभाषा बनाना होगा।
हम कह सकते हैं कि २१वीं सदी में हिंदी की हालत को देखते हुए कुछ जिम्मेदारियाँ हमारी भी बनती है, क्योंकि हिंदी भाषा के विकास के लिए दूसरों की प्रतीक्षा करने के बजाय आप भी कर सकते हैं। अकेले करें या समूह के आकार में करें, इन जिम्मेदारियों को पूरा करना हमारा पहला कर्तव्य होना चाहिए। इसी अँधेरे में सूरज निकलेगा और हिंदी को वास्तविक जगह मिलेगी।
