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१९८४ का वो खौफनाक मंजर

राधा गोयल
नई दिल्ली
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“उफ्फ कितना भयानक मंजर था वह।”
“किसकी बात कर रही हो आंटी ?”
सुधा एकदम जैसे सपनों से जागी और बोली कि बस उस दिन को याद कर रही हूँ।
“किस दिन को ?”
“३१ अक्टूबर सन् १९८६ का दिन था बेटा। उसी दिन तेरे अंकल की पदोन्नति हुई थी। इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी, लेकिन तब तक यह खबर लीक नहीं हुई थी। अगले दिन १ नवम्बर १९८४ को अपनी ज्वाइनिंग रिपोर्ट देने के लिए दूसरे दफ्तर गए थे, वहीं पर पता लगा कि राज्य में बुरी तरह से दंगे शुरू हो गए हैं और मार-काट मची हुई है। सारे दफ्तर, स्कूल-वगैरह सभी में छुट्टी कर दी गई है। तेरे अंकल के पास टू व्हीलर था। अपनी ज्वाइनिंग रिपोर्ट मेज पर रखकर फौरन वहाँ से भागे। मैं उस समय विष्णु गार्डन के एक स्कूल में नौकरी करती थी, वहाँ से मुझे लिया। रास्ते में ही खौफनाक मंजर देखा था। एक कोयले की टाल थी, उसी के पास कुछ लोगों ने एक सरदार को हमने जिंदा जलाते हुए देखा। इसलिए इतनी अधिक दहशत हो गई थी, कि बता नहीं सकते, क्योंकि बस स्टॉप पर जाने के लिए वही रास्ता था। उस रास्ते से तो बेटियाँ बस स्टॉप तक जा ही नहीं सकती थीं, तो कहाँ रह रही होंगी ? तिलक नगर के स्कूल में पढ़ती थीं। स्कूल की छुट्टी हो चुकी थी। हमारी तो जान हलक में अटक गई, क्योंकि जिस रास्ते से…. पररररर.. ” कहते- कहते फिर आंटी का गला भर आया।
खुद को संयत करके जैसे-तैसे बोली, “उनकी कोई सहपाठी स्कूल के पास ही रहती थी। दोनों उसी के घर चली गई थीं। मेरी बेटी छज्जे में खड़ी हुई थी। पापा-पापा कहकर आवाज लगाई तो जान में जान आई। हम तीनों को छोड़कर ये फौरन बेटे को लेने के लिए भागे, क्योंकि वह जनकपुरी के स्कूल में पढ़ता था। जब तक ये घर में नहीं आ गए, हमारी जान हलक में अटकी रही” कहते-कहते सुधा का गला भर आया और वो फिर से न जाने किन खयालों में खो गई।
“आंटी किन ख्यालों में खो गई हो ? पूरी बात तो बताओ।”
“ओहो! पता नहीं क्यों, जब भी उस दिन की याद करती हूँ, तो यही हाल हो जाता है और वह सारे दृश्य आँखों के सामने तैर जाते हैं। वेतन तो मिला नहीं था और पहले नौकरीपेशा लोग वेतन मिलने के बाद ही घर के लिए १ महीने का राशन लाते थे। मुश्किल से १-२ दिन के लिए दाल-वगैरा पड़ी होती थी।शुक्र है कि घर में आटा था। ३ दिन तक कर्फ्यू लग गया। मिल्क बूथ के अलावा कोई दुकान नहीं खुली, कोई सब्जी वाला नहीं बैठा। घर में बनाने के लिए कोई सब्जी नहीं थी।२ दिन दाल बनाई। फिर तीसरे दिन तेरे अंकल बड़ी मुश्किल से ढूँढ कर कहीं से एक मूली लेकर आए। सिर्फ १ मूली मिली। जिंदगी में पहली बार पता लगा कि मूली के छिलकों के परांठे भी बन सकते हैं। इतना स्वाद लगा कि बता नहीं सकती।
उन दिनों हर सरदार डरा हुआ था। सबके दिलों में खौफ था। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि जगह-जगह सरदारों का जो कत्लेआम हुआ… वह किसने किया ? आम जनता ने तो बिल्कुल नहीं किया। हमारी अपनी गली में भी सरदारों का १ परिवार रहता था।पूरी गली ने उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाई। मेरा घर बिल्कुल कोने पर था और घर के साथ ही बहुत बड़ा डिस्ट्रिक्ट पार्क है। २ मंजिल बना हुआ था तो उसकी छत से सब कुछ नजर आता था, कि किस तरह से रात को गाँव के लोग लाठी लेकर शोर मचाते हुए निकलते थे। मेरी छत पर रात को गली के लोग बारी-बारी से पहरा देते थे।
पहले फोल्डिंग पलंग होते थे। छत पर उनको ही बिछाकर बारी- बारी कुछ लोग जागते थे और कुछ लोग सो जाते थे। २-२ घंटे की बारी बाँधी हुई थी। उनके लिए चाय बनाने की जिम्मेदारी मेरी होती थी तो हर २ घंटे बाद मैं उनको चाय बनाकर देती थी। हालाँकि, मेरे घर की एक गली छोड़कर दूसरी गली में एक कोने का ३ मंजिला मकान था जहाँ से और भी साफ नजर आता था, लेकिन जिम्मेदारी हर कोई तो नहीं उठा सकता ना। यह सौभाग्य भी भगवान किसी-किसी को सुपात्र समझ कर ही देता है। शायद इसीलिए मुझे यह सौभाग्य मिला, कि मैं कुछ सेवा कर सकूँ।
कुछ साल बाद मेरी प्रोन्नति एक ऐसे स्कूल में हुई, जहाँ पर चतुर्थ श्रेणी में नौकरी पर लगाई गई २ ऐसी स्त्रियाँ थीं, जिनके पतियों को उन दंगों के दौरान मार दिया गया था। उन्हें तिलक विहार में घर मिला था। उनसे ही बहुत सारी बातें सुनने को मिलीं, कि किस तरह से उनके पतियों को बाल पकड़-पकड़ कर पीटा गया और जिंदा जलाया गया। कईयों के बच्चों को भी मार दिया गया। जो बचे, उन सभी ने अपने बच्चों के बाल कटवा दिए।
“घर मिल गया। पैसा भी मिल गया… लेकिन जब बच्चे भी नहीं रहे… घरवाला भी नहीं रहा, तो क्या हमारा वह दर्द… जो हमने देखा है और झेला है… वह दूर हो जाएगा ? क्या सरकारी नौकरी मिलने से हमारा वह दर्द दूर हो जाएगा ?” कहते-कहते उनकी आँखों में जो दर्द झलकता था, वह बर्दाश्त नहीं होता था। मन तो करता था कि उनसे विस्तारपूर्वक सारी बातें पूछूँ, लेकिन उनके बहते हुए आँसुओं को देखकर पूछने की हिम्मत नहीं होती थी। हमने तो केवल एक सरदार को जिन्दा जलते हुए देखा, जो हमारे लिए एकदम अपरिचित था तो जिन्होंने अपनों की ऐसी दर्दनाक मौत अपनी आँखों से देखी, उनकी पीड़ा का वर्णन करना तो शब्दों की ताकत से बाहर की बात है।