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खुशियों से दूरी है

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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जीवन संघर्ष…..

मैं मजदूर हूँ, मजबूर हूँ, खुशियों से दूरी है
तकदीर लिखी है रब ने कैसी!हर पल ही मजबूरी है।

भार धरा पर खूब उठाता,
पर पीड़ा कोई जान ना पाता
शायद किस्मत की यही मंजूरी है।
मैं मजदूर…।

हो युग भले ज्ञानी-विज्ञानी,
मैंने तो सदा तकलीफें जानी
क्या अथक वेदना सहना मुझे ही जरूरी है ?
मैं मजदूर…।

तरसता हूँ हर सुविधा, हर खुशी को,
मिले ना रंग-ढंग इस जिंदगी को।
जीना ऐसे ही मेरी मजबूरी है,
मैं मजदूर…॥