डॉ. विद्या ‘सौम्य’
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
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‘हिन्दी दिवस’ विशेष…
मैं हिंदी हूँ हिंदुस्तान की,
ब्रह्म के मुख का सार भी मैं हूँ
वेदों का अभिमान भी मैं हूँ,
शिव के डमरू से निःश्रृत
अविनाशी झंकार भी मैं हूँ,
प्रकट होती मधुर गीतों में,
भावों का अनुराग भी मैं हूँ
हाँ…
मैं हिंदी हूँ हिंदुस्तान की।
बिखरी हूँ मैं सकल भारत में,
जन-जन की आवाज़ भी मैं हूँ
अटल, अदम्य, साहस से भरी,
वट वृक्ष की पहचान भी मैं हूँ
ममता के आँचल-सी सुरभित,
बालक की मुस्कान भी मैं हूँ
हाँ…
मैं हिंदी हूँ हिंदुस्तान की।
देवों की वाणी से मुखरित,
लिपियों का इतिहास भी मैं हूँ
चित्र भी हूँ, भाव भी हूँ,
प्रतीक भी हूँ, सूत्र भी हूँ
सहज भी हूँ, सरल भी हूँ,
सुसंकृत और सुबोध भी हूँ
हाँ…
मैं हिंदी हूँ हिंदुस्तान की।
शक्ति के जैसा रूप अनेक,
बोलियों का भंडार भी मैं हूँ
कवियों के गीतों में गुंजित,
भंवरों की गुंजार भी मैं हूँ
चातक की, वेदना से विचलित,
स्वाति की बौछार भी मैं हूँ
अखण्ड भारत में जगमग करती,
मस्तक की सरताज भी मैं हूँ।
हाँ…,
मैं हिंदी हूँ हिंदुस्तान की॥
